लयबद्ध विरुत्तम् छन्द में 120 पाशुर। भगवान तक पहुँचने से पहले अनेक मार्गों में खोज कर चुके तिरुमळिशै आळ्वार् घोषणा करते हैं कि श्रीमन्नारायण ही सबके कारण हैं और हर जीव के अन्तरात्मा हैं। इसका भाव चिन्तनशील और दृढ़ है, और यह श्रीरंगम् तथा तिरुक्कुडन्दै सहित कई दिव्यदेशों का भी गान करता है।
पाशुर, दस-दस करके
1-10पू निलाय ऐंदुमाय् पुऩऱ्कण्…10 पाशुर
11-20सॊल्लिऩाल् तॊडर्च्चि नी सॊलप्पडुम्…10 पाशुर
21-30अरंगऩे तरंग नीर् कलंग…10 पाशुर
31-40कालनेमि कालऩे कणक्कु इलाद…10 पाशुर
41-50आयऩ् आगि आयर् मंगै…10 पाशुर
51-60सरंगळैत् तुरंदु विल् वळैत्तु…10 पाशुर
61-70नडंद काल्गळ् नॊंदवो? नडुंग…10 पाशुर
71-80वंडु उलावु कोदै मादर्…10 पाशुर
81-90कडैंद पाऱ्कडऱ् किडंदु कालनेमियैक्…10 पाशुर
91-100पण् उलावु मॆऩ् मॊऴिप्…10 पाशुर
101-110इरंदु उरैप्पदु उंडु वाऴि…10 पाशुर
111-120वैदु निऩ्ऩै वल्लवा पऴित्तवर्क्कुम्…10 पाशुर