नम्माळ्वार् की चार रचनाओं में पहली — सौ पाशुर, जिन्हें सम्प्रदाय ऋग्वेद का सार मानता है। यह भगवान की सेवा के लिए इस देह-बन्धन से मुक्ति की प्रार्थना से आरम्भ होती है, और इसके अधिकांश पाशुर भगवान से प्रेम करने वाली कन्या (नायिका भाव), उसकी माँ और उसकी सखी के स्वर में हैं।
पाशुर, दस-दस करके
1-10पॊय्न् निऩ्ऱ ञाऩमुम् पॊल्ला…10 पाशुर
11-20अरियऩ याम् इऩ्ऱु काण्गिऩ्ऱऩ…10 पाशुर
21-30सूट्टु नल् मालैगळ् तूयऩ…10 पाशुर
31-40इशैमिऩ्गळ् तूदु ऎऩ्ऱु इशैत्ताल्…10 पाशुर
41-50ऎऩ्ऱुम् पुऩ् वाडै इदु…10 पाशुर
51-60मलै कॊंडु मत्ता अरवाल्…10 पाशुर
61-70वाशगम् सॆय्वदु नंबरमे तॊल्लै…10 पाशुर
71-80ऊऴिगळ् आय् उलगु एऴुम्…10 पाशुर
81-90उऱुगिऩ्ऱ कऩ्मंगळ् मेलऩ ओर्प्पिलराय्…10 पाशुर
91-100सुरुंगु उऱि वॆण्णॆय् तॊडु…10 पाशुर