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श्रीमते रामानुजाय नमः
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तिरुविरुत्तम् 11-20

पाशुर 11-20 · 10 पाशुर

तिरुविरुत्तम् 11 · चार हज़ार में 2488वाँ पाशुर

अरियऩ याम् इऩ्ऱु काण्गिऩ्ऱऩ कण्णऩ् विण् अऩैयाय्पॆरियऩ कादम् पॊरुट्को पिरिवु ऎऩ ञालम् ऎय्दऱ्कुउरियऩ ऒण् मुत्तुम् पैम् पॊऩ्ऩुम् एंदि ओरो कुडंगैप्पॆरियऩ कॆंडैक् कुलम् इवैयो वंदु पेर्गिऩ्ऱवे

अर्थ

(नायक कहता है।) आज जो मैं देख रहा हूँ, वह कुछ दुर्लभ है! हे कण्णन् के स्वर्ग जैसी सुन्दरी, जब मैंने बिछड़ने की, धन के लिए बहुत लम्बे योजन जाने की बात की, तो ये मछलियों के बड़े झुण्ड, तुम्हारी आँखें, हर एक अंजलि भर की, आँसुओं के उजले मोती और पीलेपन का ताज़ा सोना लिए चल पड़ीं, ऐसे ख़ज़ाने जो सारे संसार के बराबर हैं।

शब्दशः

अरियऩ
दुर्लभ चीज़ें
कण्णऩ् विण् अऩैयाय्
हे कण्णन् के स्वर्ग जैसी सुन्दरी
पॊरुट्को पिरिवु
बिछड़ना, धन के लिए?
ऒण् मुत्तुम् पैम् पॊऩ्ऩुम्
उजले मोती (आँसू) और ताज़ा सोना (पीलापन)
कुडंगैप्
अंजलि भर के
कॆंडैक् कुलम्
मछलियों का झुण्ड, उसकी आँखें
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तिरुविरुत्तम् 12 · चार हज़ार में 2489वाँ पाशुर

पेर्गिऩ्ऱदु मणि मामै पिऱंगि अळ्ळल् पयलैऊर्गिऩ्ऱदु कंगुल् ऊऴिगळे इदु ऎल्लाम् इऩवेईर्गिऩ्ऱ सक्करत्तु ऎम् पॆरुमाऩ् कण्णऩ् तण् अम् तुऴाय्सार्गिऩ्ऱ नल् नॆंजिऩार् तंदु पोऩ तऩि वळमे

अर्थ

(सखी कहती है।) उसका चमकीला, रत्न-सा श्याम रंग फीका पड़ रहा है; पीलापन कीचड़ की तरह उस पर फैल रहा है; रातें युगों की तरह रेंगती हैं। यह सब एक ही प्रकार का है: उस भले हृदय वाले की दी हुई अनोखी सम्पदा, जो जाने से पहले उसे दे गया, जिसका हृदय काटने वाले चक्रधारी हमारे प्रभु कण्णन् की शीतल, सुन्दर तुलसी से चिपका है।

शब्दशः

मणि मामै
उसका रत्न-सा श्याम रंग
अळ्ळल् पयलै
कीचड़ की तरह फैलता पीलापन
ऊर्गिऩ्ऱदु कंगुल् ऊऴिगळे
रातें युगों की तरह रेंगती हैं
ईर्गिऩ्ऱ सक्करत्तु
काटने वाले चक्र के साथ
सार्गिऩ्ऱ नल् नॆंजिऩार्
भले हृदय वाला जिसका हृदय उससे चिपका है
तऩि वळमे
अनोखी सम्पदा (दुःख में कही बात)
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तिरुविरुत्तम् 13 · चार हज़ार में 2490वाँ पाशुर

तऩि वळर् सॆंगोल् नडावु तऴल् वाय् अरशु अवियपऩि वळर् सॆंगोल् इरुळ् वीऱ्ऱिरुंदु पार् मुऴुदुम्तुऩि वळर् कादल् तुऴायैत् तुऴावु तण् वाडै तडिंदुइऩि वळै काप्पवर् आर्? ऎऩै ऊऴिगळ् ईर्वऩवे

अर्थ

(कन्या कहती है।) अग्निमुख राजा सूर्य, जो अपना अकेला, सदा बढ़ता राजदण्ड चलाता था, बुझ गया है। अन्धकार अपने ठण्डे राजदण्ड के साथ सारी पृथ्वी पर सिंहासन जमाए बैठा है। ठण्डा उत्तरी पवन, जो उस तुलसी में से होकर आया है जिसके लिए मेरा प्रेम दुःख में बदलता जाता है, मुझ पर प्रहार करता है। अब मेरी चूड़ियों को फिसलने से कौन बचाएगा? ये रातें कितने युग हैं, हर एक मुझे काटती हुई!

शब्दशः

तऴल् वाय् अरशु अविय
अग्निमुख राजा सूर्य का बुझ जाना
इरुळ् वीऱ्ऱिरुंदु
अन्धकार सिंहासन पर बैठा
तुऩि वळर् कादल्
दुःख में बढ़ता प्रेम
तुऴायैत् तुऴावु तण् वाडै
तुलसी में से होकर आया ठण्डा उत्तरी पवन
वळै काप्पवर् आर्
मेरी चूड़ियों की रक्षा कौन करेगा?
ऊऴिगळ् ईर्वऩवे
मुझे काटते युग
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तिरुविरुत्तम् 14 · चार हज़ार में 2491वाँ पाशुर

ईर्वऩ वेलुम् अम् सेलुम् उयिर्मेल् मिळिर्ंदु इवैयोपेर्वऩवो अल्ल तॆय्व नल् वेळ् कणैप् पेर् ऒळियेसोर्वऩ नीलच् चुडर् विडु मेऩि अम्माऩ् विशुंबु ऊर्तेर्वऩ तॆय्वम् अऩ्ऩीर कण्णो इच् चॆऴुङ् कयले?

अर्थ

(नायक कहता है।) काटते भालों जैसी, सुन्दर मछलियों जैसी, ये मेरे प्राणों पर ही चमकती हैं। क्या ये बस इधर-उधर डोलने वाली चीज़ें हैं? नहीं, ये उत्तम दिव्य धनुर्धर काम के बाणों का महान तेज हैं। हे उन देवियों जैसी सुन्दरी, जो उन प्रभु के स्वर्ग में रथों पर चलती हैं जिनके शरीर से नीली कान्ति बहती है, क्या ये समृद्ध मछलियाँ तुम्हारी आँखें हैं?

शब्दशः

ईर्वऩ वेलुम्
काटते भाले
उयिर्मेल् मिळिर्ंदु
मेरे प्राणों पर चमकती
तॆय्व नल् वेळ् कणैप्
उत्तम दिव्य धनुर्धर काम के बाणों का
नीलच् चुडर् विडु मेऩि
नीली कान्ति बिखेरता शरीर
तॆय्वम् अऩ्ऩीर
हे देवियों जैसी
सॆऴुङ् कयले
समृद्ध मछलियाँ, उसकी आँखें
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तिरुविरुत्तम् 15 · चार हज़ार में 2492वाँ पाशुर

कयलो नुम कण्गळ्? ऎऩ्ऱु कळिऱु विऩवि निऱ्ऱीर्अयलोर् अऱियिलुम् ईदु ऎऩ्ऩ वार्त्तै? कडल् कवर्ंदपुयलोडु उलाम् कॊंडल् वण्णऩ् पुऩ वेंगडत्तु ऎम्मॊडुम्पयलो इलीर् कॊल्लै काक्किऩ्ऱ नाळुम् पल पलवे

अर्थ

(सखी नायक से कहती है।) तुम वहाँ खड़े होकर पूछते हो, 'क्या कोई हाथी इधर से गया? क्या तुम्हारी आँखें मछलियाँ हैं?' यदि बाहर वाले जान लें, तो यह कैसी बात होगी? तुम हमारे परिचित नहीं हो, यहाँ वेङ्कटम् के वन-खेतों में, जो सागर पी चुके बादलों के साथ घूमने वाले काले वर्षा-मेघ के रंग वाले प्रभु का है। और इस खेत की रखवाली के हमारे दिन अभी बहुत बाकी हैं।

शब्दशः

कयलो नुम कण्गळ्
क्या तुम्हारी आँखें मछलियाँ हैं?
कळिऱु विऩवि
हाथी के बारे में पूछते हुए
अयलोर् अऱियिलुम्
यदि बाहर वाले जान लें
कॊंडल् वण्णऩ्
जिनका रंग वर्षा-मेघ जैसा है
पुऩ वेंगडत्तु
वेङ्कटम् के वन-खेतों में
पयलो इलीर्
तुम हमारे परिचित नहीं हो
कॊल्लै काक्किऩ्ऱ नाळुम्
ज्वार के खेत की रखवाली के दिन भी
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तिरुविरुत्तम् 16 · चार हज़ार में 2493वाँ पाशुर

पलबल ऊऴिगळ् आयिडुम् अऩ्ऱि ओर् नाऴिगैयैप्पलबल कूऱिट्ट कूऱु आयिडुम् कण्णऩ् विण् अऩैयाय्!पलबल नाळ् अऩ्बर् कूडिलुम् नींगिलुम् याम् मॆलिदुम्पलबल सूऴल् उडैत्तु अम्म वाऴि इप् पाय् इरुळे

अर्थ

(कन्या अपनी सखी से कहती है।) यह फैलता अन्धकार बहुत, बहुत से युग बन जाता है; या फिर कई-कई टुकड़ों में तोड़े गए एक क्षण का एक छोटा-सा अंश बन जाता है। हे कण्णन् के स्वर्ग जैसी सुन्दरी! हमारे प्रियतम बहुत दिनों तक हमारे साथ रहें या हमें छोड़ जाएँ, दोनों ही तरह हम घुलती जाती हैं। हाय, इस फैलते अन्धकार की कितनी, कितनी चालें हैं!

शब्दशः

पलबल ऊऴिगळ्
बहुत, बहुत से युग
ओर् नाऴिगैयैप्
एक क्षण
कूऱिट्ट कूऱु
टूटे टुकड़े का एक अंश
कण्णऩ् विण् अऩैयाय्
हे कण्णन् के स्वर्ग जैसी सुन्दरी
याम् मॆलिदुम्
हम दुबली होकर घुलती जाती हैं
पलबल सूऴल्
बहुत सी चालें, बहुत से छल
पाय् इरुळे
यह फैलता अन्धकार
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तिरुविरुत्तम् 17 · चार हज़ार में 2494वाँ पाशुर

इरुळ् विरिंदाल् अऩ्ऩ मा नीर्त् तिरैगॊंडु वाऴियरो!इरुळ् पिरिंदार् अऩ्बर् तेर् वऴि तूरल् अरवु अणैमेल्इरुळ् विरि नीलक् करु नायिऱु सुडर् काल्वदु पोल्इरुळ् विरि सोदिप् पॆरुमाऩ् उऱैयुम् ऎऱि कडले

अर्थ

(कन्या सागर से कहती है।) हे टकराते सागर, फैले अन्धकार जैसी बड़ी लहरों वाले, तुम चिरंजीवी हो! अँधेरे में मुझे छोड़ जाने वाले मेरे प्रियतम के रथ का मार्ग मत पाटो। तुम वह सागर हो जहाँ अन्धकार में फैलती कान्ति वाले प्रभु रहते हैं, जो किरणें बिखेरते गहरे नीले सूर्य की तरह नाग-शय्या पर लेटे हैं।

शब्दशः

इरुळ् विरिंदाल् अऩ्ऩ
फैले अन्धकार जैसा
तेर् वऴि तूरल्
रथ का मार्ग मत पाटो
अरवु अणैमेल्
नाग-शय्या पर
नीलक् करु नायिऱु
गहरा नीला सूर्य
इरुळ् विरि सोदिप् पॆरुमाऩ्
वे प्रभु जिनकी कान्ति अन्धकार में फैलती है
ऎऱि कडले
हे टकराती लहरों वाले सागर
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तिरुविरुत्तम् 18 · चार हज़ार में 2495वाँ पाशुर

कडल् कॊंडु ऎऴुंददु वाऩम् अव् वाऩत्तै अऩ्ऱिच् चॆऩ्ऱुकडल् कॊंडु ऒऴिंद अदऩाल् इदु कण्णऩ् मण्णुम् विण्णुम्कडल् कॊंडु ऎऴुंद अक् कालम् कॊलो? पुयल् कालम्गॊलो?कडल् कॊंड कण्णीर् अरुविशॆय्यानिऱ्कुम् कारिगैये

अर्थ

(माँ कहती है।) आकाश सागर को उठाए हुए उठ खड़ा हुआ है; और उस आकाश से परे उसके आँसू एक और सागर की तरह फैल गए हैं। तो क्या यह प्रलय का वही समय है जब सागर उठकर कण्णन् की पृथ्वी और स्वर्ग को निगल गया था? या यह वर्षा की ऋतु है? इस सुन्दर कन्या के सागर जितने गहरे आँसू झरनों की तरह बरसते जा रहे हैं।

शब्दशः

कडल् कॊंडु ऎऴुंददु वाऩम्
आकाश सागर को लिए उठा
मण्णुम् विण्णुम्
पृथ्वी और स्वर्ग
अक् कालम् कॊलो
क्या यह प्रलय का वह समय है?
पुयल् कालम्गॊलो
या यह वर्षा की ऋतु है?
कडल् कॊंड कण्णीर्
सागर समेटे आँसू
कारिगैये
यह सुन्दर कन्या
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तिरुविरुत्तम् 19 · चार हज़ार में 2496वाँ पाशुर

कारिगैयार् निऱै काप्पवर् यार् ऎऩ्ऱु कार् कॊंडु इऩ्ऩेमारि कै एऱि अऱैयिडुम् कालत्तुम् वाऴियरोसारिगैप् पुळ्ळर् अम् तण्णम् तुऴाय् इऱै कूय् अरुळार्सेरि कै एऱुम् पऴियाय् विळैंददु ऎऩ् सिल्मॊऴिक्के

अर्थ

इस ऋतु में भी, जब बादल घिर आते हैं और वर्षा ढोल पीटकर घोषणा करती है, 'अब स्त्रियों का संयम कौन बचा सकता है?', चक्कर काटते पक्षी पर सवार होने वाले, शीतल, सुन्दर तुलसी वाले प्रभु, वे चिरंजीवी हों, उसे अपने पास बुलाकर कृपा नहीं दिखाते। और इसीलिए मेरी मृदुभाषिणी कन्या के लिए यह गली में हाथों-हाथ फैलती बदनामी बनकर पक गया है।

शब्दशः

कारिगैयार् निऱै काप्पवर् यार्
स्त्रियों का संयम कौन बचाएगा?
मारि कै एऱि अऱैयिडुम्
वर्षा उठकर ढोल पीटती है
सारिगैप् पुळ्ळर्
चक्कर काटते पक्षी पर सवार होने वाले
कूय् अरुळार्
उसे बुलाकर कृपा नहीं करते
सेरि कै एऱुम् पऴियाय्
गली में हाथों-हाथ फैलती बदनामी बनकर
सिल्मॊऴिक्के
थोड़े, मृदु शब्द बोलने वाली कन्या के लिए
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तिरुविरुत्तम् 20 · चार हज़ार में 2497वाँ पाशुर

सिल्मॊऴि नोयो कऴि पॆरुन् तॆय्वम् इन् नोय् इऩदु ऎऩ्ऱुइल् मॊऴि केट्कुम् इळन् तॆय्वम् अऩ्ऱु इदु वेल निल् नीऎऩ् मॊऴि केळ्मिऩ् ऎऩ् अम्मऩैमीर् उलगु एऴुम् उंडाऩ्सॊल् मॊऴि मालै अम् तण्णम् तुऴाय्गॊंडु सूट्टुमिऩे

अर्थ

(सखी माताओं से कहती है।) मृदुभाषिणी कन्या का यह रोग एक अत्यन्त महान भगवान का किया हुआ है। यह कोई छोटा देवता नहीं, जो घर की बातें सुनकर कहे कि रोग इस प्रकार का है या उस प्रकार का। हे शकुन बताने वाले, रुक जाओ! मेरी बात सुनो, मेरी माताओ: जिन्होंने सातों लोक निगल लिए, उनकी प्रसिद्ध शीतल, सुन्दर तुलसी की माला लाकर उसे पहना दो।

शब्दशः

सिल्मॊऴि नोयो
मृदुभाषिणी कन्या का रोग
कऴि पॆरुन् तॆय्वम्
एक अत्यन्त महान भगवान
इळन् तॆय्वम् अऩ्ऱु
कोई छोटा देवता नहीं
वेल निल् नी
हे शकुन बताने वाले, तुम रुको!
अम्मऩैमीर्
हे मेरी माताओ
उलगु एऴुम् उंडाऩ्
जिन्होंने सातों लोक निगले
तण्णम् तुऴाय्गॊंडु सूट्टुमिऩे
शीतल तुलसी लाकर उसे पहना दो
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।