उसी रात तिरुक्कोवलूर में भूतत्ताळ्वार् द्वारा गाए गए सौ पाशुर। वे प्रेम का दीप जलाते हैं (इरण्डाम् तिरुवन्दादि 1)। आचार्य समझाते हैं कि पोय्गै आळ्वार् का दीप भगवान का ज्ञान है, और यह दूसरा दीप उस ज्ञान से बढ़ने वाला प्रेम।
पाशुर, दस-दस करके
1-10अऩ्बे तगळिया आर्वमे नॆय्…10 पाशुर
11-20कडै निऩ्ऱु अमरर् कऴल्…10 पाशुर
21-30ताम् उळरे तम् उळ्ळम्…10 पाशुर
31-40पिराऩ् ऎऩ्ऱुम् नाळुम् पॆरुम्…10 पाशुर
41-50पॊरुळाल् अमर् उलगम् पुक्कु…10 पाशुर
51-60मदिक् कंडाय् नॆंजे मणिवण्णऩ्…10 पाशुर
61-70निऩ्ऱदु ओर् पादम् निलम्…10 पाशुर
71-80इडंगै वलंबुरि निऩ्ऱु आर्प्प…10 पाशुर
81-90पगल् कंडेऩ् नारणऩैक् कंडेऩ्…10 पाशुर
91-100पिऩ्ऩाल् अरु नरगम् सेरामल्…10 पाशुर