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तिरुप्पावै 6

आण्डाळ् की रचना · चार हज़ार में 479वाँ पाशुर

तिरुप्पावै 6 · चार हज़ार में 479वाँ पाशुर

पुळ्ळुम् सिलंबिऩ काण् पुळ्-अरैयऩ् कोयिलिल्वॆळ्ळै विळि संगिऩ् पेर्-अरवम् केट्टिलैयो?पिळ्ळाय् ऎऴुंदिराय् पेय्मुलै नंजु उंडुकळ्ळच् चगडम् कलक्कु अऴियक् काल् ओच्चिवॆळ्ळत्तु अरविऱ् तुयिल् अमर्ंद वित्तिऩैउळ्ळत्तुक् कॊंडु मुऩिवर्गळुम् योगिगळुम्मॆळ्ळ ऎऴुंदु अरि ऎऩ्ऱ पेर्-अरवम्उळ्ळम् पुगुंदु कुळिर्ंदु-एलोर् ऎंबावाय्

अर्थ

(कन्याएँ व्रत में नई आई एक सखी को जगाती हैं।) देखो, पक्षी चहचहा रहे हैं! क्या तुम पक्षिराज गरुड़ के स्वामी के मन्दिर से पुकारते श्वेत शंख की गूँज नहीं सुनती? छोटी बाला, उठो! उन्होंने राक्षसी के दूध के साथ विष पी लिया, छल-भरी गाड़ी को लात मारकर तोड़ दिया; वे जल में शेष पर विश्राम करने वाले सबके बीज हैं। उन्हें हृदय में धारण किए मुनि और योगी धीरे-धीरे उठकर हरि कहते हैं, और उस महान ध्वनि ने हमारे हृदयों में प्रवेश करके उन्हें शीतल कर दिया है।

शब्दशः

पुळ्ळुम् सिलंबिऩ
पक्षी चहचहा रहे हैं
पुळ्-अरैयऩ् कोयिलिल्
पक्षिराज गरुड़ के स्वामी के मन्दिर में
वॆळ्ळै विळि संगिऩ्
पुकारते श्वेत शंख की
पेय्मुलै नंजु उंडु
पूतना के स्तन से विष पीकर
कळ्ळच् चगडम्
छल-भरी गाड़ी, वेश बदले असुर
वित्तिऩै
बीज, सबका कारण
अरि ऎऩ्ऱ पेर्-अरवम्
हरि नाम की महान ध्वनि
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।