तिरुप्पावै 7 · चार हज़ार में 480वाँ पाशुर
कीशु कीशु ऎऩ्ऱु ऎंगुम् आऩैच्चात्तऩ् कलंदुपेशिऩ पेच्चु- अरवम् केट्टिलैयो? पेय्प् पॆण्णेकाशुम् पिऱप्पुम् कलगलप्पक् कैबेर्त्तुवाश नऱुङ् कुऴल् आय्च्चियर् मत्तिऩाल्ओशै पडुत्त तयिर्-अरवम् केट्टिलैयो?नायगप् पॆण्बिळ्ळाय् नारायणऩ्मूर्त्तिकेशवऩैप् पाडवुम् नी केट्टे किडत्तियो?तेशम् उडैयाय् तिऱ-एलोर् ऎंबावाय्
अर्थ
क्या तुम हर ओर कीसु कीसु करते चहचहाते काले पक्षियों को नहीं सुनती? भोली लड़की! क्या तुम मथानी की आवाज़ नहीं सुनती, जब सुगन्धित केशों वाली ग्वालिनें अपनी बाँहें चलाती हैं, उनके सिक्कों के हार खनकते हैं, और मथानियों के नीचे दही गरजता है? हे कन्याओं की मुखिया, जब हम नारायण, केशव गा रही हैं, क्या तुम वहाँ लेटी बस सुनती रह सकती हो? हे तेजस्विनी, द्वार खोलो!
शब्दशः
- आऩैच्चात्तऩ्
- काले पक्षी, भारद्वाज पक्षी
- पेय्प् पॆण्णे
- भोली लड़की
- काशुम् पिऱप्पुम्
- उनके सिक्कों और मनकों के हार
- तयिर्-अरवम्
- मथे जाते दही की आवाज़
- नायगप् पॆण्बिळ्ळाय्
- हे कन्याओं की मुखिया
- केशवऩैप्
- केशव, सुन्दर केशों वाले प्रभु
- तेशम् उडैयाय्
- हे तेजस्विनी
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।