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श्रीमते रामानुजाय नमः
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तिरुप्पावै 27

आण्डाळ् की रचना · चार हज़ार में 500वाँ पाशुर

तिरुप्पावै 27 · चार हज़ार में 500वाँ पाशुर

कूडारै वॆल्लुम् सीर्क् कोविंदा उऩ्दऩ्ऩैप्पाडिप् पऱैगॊंडु याम् पॆऱु सम्माऩम्नाडु पुगऴुम् परिशिऩाल् नऩ्ऱागच्सूडगमे तोळ्वळैये तोडे सॆविप् पूवेपाडगमे ऎऩ्ऱु अऩैय पल् कलऩुम् याम् अणिवोम्आडै उडुप्पोम् अदऩ् पिऩ्ऩे पाऱ् सोऱुमूड नॆय् पॆय्दु मुऴंगै वऴिवारक्कूडियिरुंदु कुळिर्ंदु-एलोर् ऎंबावाय्

अर्थ

हे गोविन्द, गौरवशाली प्रभु, जो तुम्हारे पास न आने वालों को भी जीत लेते हो! तुम्हें गाकर और ढोल पाकर हमें जो पुरस्कार मिलेगा, उसकी सारा देश प्रशंसा करेगा। हम हर तरह के सुन्दर आभूषण पहनेंगी: कंगन, बाजूबन्द, कर्णफूल, कान के फूल और नूपुर। हम नए वस्त्र पहनेंगी। और फिर, साथ बैठकर, हम दूध में पका चावल खाएँगी, जो घी से इतना ढका हो कि हमारी कोहनियों तक बह आए, और हमारे हृदय आनन्द से शीतल हो जाएँगे।

शब्दशः

कूडारै वॆल्लुम्
जो उनसे न जुड़ने वालों को भी जीत लेते हैं
कोविंदा
गोविन्द, गायों के रक्षक
सम्माऩम्
पुरस्कार, सम्मान का उपहार
सूडगमे तोळ्वळैये
कंगन और बाजूबन्द
तोडे सॆविप् पूवे
कर्णफूल और कान के फूल
पाऱ् सोऱु
दूध में पका चावल
मुऴंगै वऴिवारक्
कोहनियों तक बहता हुआ
कूडियिरुंदु कुळिर्ंदु
साथ बैठकर, आनन्द से शीतल होकर
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।