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श्रीमते रामानुजाय नमः
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तिरुप्पावै 15

आण्डाळ् की रचना · चार हज़ार में 488वाँ पाशुर

तिरुप्पावै 15 · चार हज़ार में 488वाँ पाशुर

ऎल्ले इळंगिळिये इऩ्ऩम् उऱंगुदियोसिल् ऎऩ्ऱु अऴैयेऩ्मिऩ् नंगैमीर् पोदर्गिऩ्ऱेऩ्वल्लै उऩ् कट्टुरैगळ् पंडे उऩ् वाय् अऱिदुम्वल्लीर्गळ् नींगळे नाऩे ताऩ् आयिडुगऒल्लै नी पोदाय् उऩक्कु ऎऩ्ऩ वेऱु उडैयै?ऎल्लारुम् पोंदारो? पोंदार् पोंदु ऎण्णिक्कॊळ्वल् आऩै कॊऩ्ऱाऩै माऱ्ऱारै माऱ्ऱु अऴिक्कवल्लाऩै मायऩैप् पाडु-एलोर् ऎंबावाय्

अर्थ

(द्वार पर एक बातचीत।) अरी, नन्ही तोती, क्या तुम अब भी सो रही हो? सखियो, मुझ पर इतनी तीखी आवाज़ में मत चिल्लाओ, मैं आ रही हूँ। तुम बड़ी चतुर हो; हम तुम्हारी तेज़ ज़बान को बहुत पहले से जानती हैं। चतुर तो तुम सब हो। चलो, दोष मेरा ही सही। जल्दी बाहर आओ! तुम्हें और करना ही क्या है? क्या सब आ गईं? आ गईं; बाहर आकर गिन लो। आओ, उन अद्भुत प्रभु को गाओ, जिन्होंने बलवान हाथी को मारा और जो अपने शत्रुओं का बल मिटा सकते हैं।

शब्दशः

ऎल्ले इळंगिळिये
अरी, नन्ही तोती
सिल् ऎऩ्ऱु अऴैयेऩ्मिऩ्
इतनी तीखी आवाज़ में मत पुकारो
कट्टुरैगळ्
तीखे, चतुर वचन
नाऩे ताऩ् आयिडुग
मैं ही सही, दोष मेरा ही सही
ऎण्णिक्कॊळ्
स्वयं गिन लो
वल् आऩै कॊऩ्ऱाऩै
जिन्होंने बलवान हाथी कुवलयापीड को मारा
मायऩैप्
अद्भुत प्रभु
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।