तिरुप्पावै 14 · चार हज़ार में 487वाँ पाशुर
उंगळ् पुऴैक्कडैत् तोट्टत्तु वावियुळ्सॆंगऴुनीर् वाय् नॆगिऴ्ंदु आंबल् वाय् कूंबिऩ काण्सॆंगऱ्पॊडिक् कूऱै वॆण्बऱ् तवत्तवर्तंगळ् तिरुक्कोयिऱ् संगिडुवाऩ् पोदंदार्ऎंगळै मुऩ्ऩम् ऎऴुप्पुवाऩ् वाय् पेशुम्नंगाय् ऎऴुंदिराय् नाणादाय् नावुडैयाय्संगॊडु सक्करम् एंदुम् तडक्कैयऩ्पंगयक् कण्णाऩैप् पाडु-एलोर् ऎंबावाय्
अर्थ
देखो, तुम्हारे घर के पीछे के बगीचे के तालाब में लाल कुमुदिनियाँ खिल गई हैं और रात्रि-कुमुद बन्द हो गए हैं। गेरुए वस्त्रों वाले, सफ़ेद दाँतों वाले संन्यासी शंख बजाने अपने मन्दिर जा रहे हैं। हे कन्या, जिसने डींग मारी थी कि तुम सबसे पहले हमें जगाओगी, उठो! हे निर्लज्ज, बातूनी! उन कमल-नयन प्रभु को गाओ जिनके विशाल हाथ शंख और चक्र धारण करते हैं।
शब्दशः
- पुऴैक्कडैत् तोट्टत्तु
- घर के पीछे के बगीचे में
- सॆंगऴुनीर् वाय् नॆगिऴ्ंदु
- लाल कुमुदिनियाँ खिल गई हैं
- आंबल् वाय् कूंबिऩ
- रात्रि-कुमुद बन्द हो गए हैं
- सॆंगऱ्पॊडिक् कूऱै
- लाल गेरू में रँगे वस्त्र
- नाणादाय् नावुडैयाय्
- निर्लज्ज, चतुर जीभ वाली
- तडक्कैयऩ्
- विशाल हाथों वाले प्रभु
- पंगयक् कण्णाऩैप्
- कमल-नयन प्रभु
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।