तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि 3
तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् की रचना · चार हज़ार में 919वाँ पाशुर
तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि 3 · चार हज़ार में 919वाँ पाशुर
अर्थ
चारों ओर की सभी दिशाओं में उजला प्रकाश फैल गया है। घने तारों की चमक फीकी पड़ गई है, और शीतल चन्द्रमा का फैला हुआ प्रकाश मन्द हो गया है। विशाल अन्धकार चला गया है। हरे उपवनों में सुपारी के पेड़ों के कोषों से फूटते भरपूर पुष्प-गुच्छों की सुगन्ध लिए भोर की हवा तेज़ हो गई है। हे श्रीरङ्गम् के प्रभु, जिनके सुन्दर विशाल हाथ में प्रबल तेज वाला चक्र चमकता है, कृपा करके अपनी नींद से उठो!
शब्दशः
- सूऴ् तिशै ऎल्लाम्
- चारों ओर की सभी दिशाओं में
- तुऩ्ऩिय तारगै
- घने तारे
- पऩि मदि
- शीतल चन्द्रमा
- पैम् पॊऴिऱ् कमुगिऩ्
- हरे उपवनों में सुपारी के पेड़ों का
- वण् पाळैगळ् नाऱ
- भरपूर पुष्प-गुच्छ सुगन्ध बिखेर रहे हैं
- वैगऱै
- भोर
- अडल्-ऒळि तिगऴ् तरु तिगिरि
- प्रबल तेज से चमकता चक्र
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।