तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि 2
तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् की रचना · चार हज़ार में 918वाँ पाशुर
तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि 2 · चार हज़ार में 918वाँ पाशुर
अर्थ
यह रही पूर्वी हवा, जो घनी चमेली की बेल के भरपूर फूलों को छूकर तेज़ी से बह रही है। फूलों की शय्या पर सोए हंस जाग उठे हैं, गिरती ओस में भीगे अपने बड़े पंख झाड़ते हुए। तुमने उस हाथी की कड़वी पीड़ा मिटा दी जो विष से मूर्च्छित होकर दर्द से चीख रहा था, जब मगरमच्छ के गुफा जैसे खुले मुँह के सफ़ेद दाँत उसमें धँस गए थे। हे श्रीरङ्गम् के प्रभु, कृपा करके अपनी नींद से उठो!
शब्दशः
- कॊऴुंगॊडि मुल्लैयिऩ्
- घनी चमेली की बेल का
- कुण-तिशै मारुदम्
- पूर्वी हवा
- मलर् अणैप् पळ्ळिगॊळ् अऩ्ऩम्
- फूलों की शय्या पर सोए हंस
- ईऩ्बणि नऩैंद
- गिरती ओस में भीगे
- मुदलैयिऩ्
- मगरमच्छ का
- पिलम् पुरै पेऴ्वाय्
- गुफा जैसा खुला मुँह
- आऩैयिऩ् अरुंदुयर् कॆडुत्त
- जिन्होंने हाथी गजेन्द्र की कड़वी पीड़ा मिटाई
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।