तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि 1
तोण्डरडिप्पोडि आळ्वार् की रचना · चार हज़ार में 917वाँ पाशुर
तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि 1 · चार हज़ार में 917वाँ पाशुर
अर्थ
सूर्य आकर पूर्वी पहाड़ियों की चोटी पर पहुँच गया है। घना अन्धकार चला गया है, और यह भोर का सुन्दर समय है। सारे बड़े फूल खिल गए हैं और उनका मधु बह रहा है। देवों के राजा भीड़ लगाते हुए आ गए हैं और तुम्हारे सामने का स्थान भर रहे हैं। उनके साथ आए विशाल दन्तैल हाथियों के झुण्ड, अपनी हथिनियों और नगाड़ों के साथ, हर ओर लहरों से उछलते सागर जैसा गर्जन कर रहे हैं। हे श्रीरङ्गम् के प्रभु, कृपा करके अपनी नींद से उठो!
शब्दशः
- कदिरवऩ्
- सूर्य
- कुणदिशैच् चिगरम्
- पूर्व की चोटी
- कऩै इरुळ् अगऩ्ऱदु
- घना अन्धकार चला गया है
- मदु विरिंदु ऒऴुगिऩ
- खिलकर मधु बहा रहे हैं
- वाऩवर् अरशर्गळ्
- देवों के राजा
- इरुङ् कळिऱ्ऱु ईट्टमुम्
- विशाल दन्तैल हाथियों के झुण्ड
- अरंगत्तम्मा
- हे श्रीरङ्गम् के प्रभु
- पळ्ळि ऎऴुंदरुळाये
- कृपा करके अपनी शय्या से उठो
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।