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श्रीमते रामानुजाय नमः
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सिरिय तिरुमडल्

तिरुमङ्गै आळ्वार् की रचना · 40 पाशुर

प्राचीन तमिल रीति में, यदि प्रियतम न आए तो कन्या ताड़ की डण्ठलों से बने घोड़े — मडल् — पर सवार होकर गलियों में घूम सकती थी, ताकि लज्जित होकर वह आ जाए। इस लम्बी, अटूट कविता में तिरुमङ्गै आळ्वार् भगवान से प्रेम करने वाली कन्या बनकर ठीक यही करने का निश्चय करते हैं। चार हज़ार की गिनती में इसके द्विपदों को 40 पाशुर गिना जाता है।

पाशुर, दस-दस करके