पेरिय तिरुमोळि 10.8.1 · चार हज़ार में 1922वाँ पाशुर
अर्थ
(एक ग्वालिन देर रात आए कृष्ण से रूठती है।) कानों में बालियाँ, बदन पर लिपटा बढ़िया वस्त्र, पराग से भरी सुन्दर शीतल तुलसी से सजे, तुमने समय बीत जाने दिया, और अब आकर बाहर खड़े हो। क्यों? यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- कादिल् कडिप्पु इट्टु
- कानों में बालियाँ
- कलिंगम् उडुत्तु
- बढ़िया वस्त्र में लिपटे
- तादु नल्ल तण् अम् तुऴाय्
- पराग से भरी सुन्दर शीतल तुलसी
- पोदु मऱुत्तु
- समय बीत जाने देकर
- पुऱमे वंदु निऩ्ऱीर्
- तुम आकर बाहर खड़े हो
पेरिय तिरुमोळि 10.8.2 · चार हज़ार में 1923वाँ पाशुर
अर्थ
गेरुए वस्त्र पहने, गेंद घुमाते, बालों को दो-फाँकी गाँठ में बाँधे, एक बढ़िया कमरबन्द कसकर बाँधे, तुम दीवार में लगे द्वार के बाहर आकर खड़े हो। यह कौन है? यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- तुवर् आडै
- गेरुआ-लाल वस्त्र
- सॆंडु सिलुप्पि
- गेंद घुमाते हुए
- कवर् आग मुडित्तु
- बाल दो-फाँकी गाँठ में बाँधे
- कलिक् कच्चुक् कट्टि
- बढ़िया कमरबन्द कसकर बाँधे
- इवर् आर्?
- यह कौन है?
पेरिय तिरुमोळि 10.8.3 · चार हज़ार में 1924वाँ पाशुर
अर्थ
ओ एकमात्र अनुपम गरुड़-ध्वजा के स्वामी, अद्वितीय सारथी, तुम जिन्होंने क्रोध में अपना पैर फैलाकर छकड़े को लुढ़का दिया! तुम प्रेम की एक धुन गाते हुए आए और घर में घुस गए। अँधेरे में, यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- करुळक् कॊडि
- गरुड़-ध्वजा
- तऩिप् पागीर्
- अद्वितीय सारथी
- उरुळच् चगडम्
- छकड़ा, लुढ़का दिया गया
- मरुळैक्कॊडु पाडि
- एक धुन, मरुळ् राग, गाते हुए
- इरुळत्तु
- अँधेरे में
पेरिय तिरुमोळि 10.8.4 · चार हज़ार में 1925वाँ पाशुर
अर्थ
ओ श्रेष्ठ नारायण, तुम जिनके इतने सारे नाम हैं, तुमसे तुलसी-माला की तेज़ सुगन्ध आ रही है! मानो तुम प्रेम के देवता कामदेव हो, ऐसे गाते हुए तुम आए और घर में घुस गए। आधी रात को, यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- नामम् पलवुम् उडै
- तुम जिनके अनेक नाम हैं
- नारण नंबी
- ओ श्रेष्ठ नारायण
- तामत् तुळवम्
- तुलसी-माला
- कामऩ् ऎऩप् पाडि
- मानो तुम कामदेव हो, ऐसे गाते हुए
- एमत्तु
- आधी रात को
पेरिय तिरुमोळि 10.8.5 · चार हज़ार में 1926वाँ पाशुर
अर्थ
घुँघराले केश लटकाए, बगल में कटार लगाए, अनेक महान रत्नों और सोने से भी सजे, तुम आँगन में आकर मुस्कुराते हुए खड़े हो गए। किसलिए? यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- सुऱ्ऱुम् कुऴल् ताऴ
- घुँघराले केश लटकाए
- सुरिगै अणैत्तु
- बगल में कटार लगाए
- मा मणि पॊऩ्
- महान रत्न और सोना
- मुऱ्ऱम् पुगुंदु
- आँगन में आकर
- मुऱुवल् सॆय्दु
- मुस्कुराते हुए
पेरिय तिरुमोळि 10.8.6 · चार हज़ार में 1927वाँ पाशुर
अर्थ
ग्वालों और गायों के झुण्डों को पीछे वहीं छोड़कर, हाथ में एक टेढ़ा, विजयी धनुष लिए, तुम यह देखकर ही भीतर आते हो कि कौन चला गया और कौन अभी यहीं है। दूसरों के सामने, यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- आऩ्-आयरुम्
- ग्वाले
- आ-निरैयुम्
- गायों के झुण्ड
- कूऩ् आयदु ओर् कॊऱ्ऱ विल्
- एक टेढ़ा, विजयी धनुष
- पोऩार् इरुंदारैयुम् पार्त्तु
- देखकर कि कौन चला गया और कौन अभी यहीं है
- एऩोर्गळ् मुऩ्
- दूसरों के सामने
पेरिय तिरुमोळि 10.8.7 · चार हज़ार में 1928वाँ पाशुर
अर्थ
ओ दूल्हे, जिनके गोल कन्धे पहलवानों से लड़े! रात में ही हम जान गए कि तुम्हारे मन में क्या था। तुम वादे करना कभी बन्द नहीं करते, फिर भी अपने बताए समय पर कभी नहीं आते। अहा, तुम! यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- मल्ले पॊरुद तिरळ् तोळ्
- पहलवानों से लड़े गोल कन्धे
- मणवाळीर्
- ओ दूल्हे
- नुम् मऩत्तिऩ् करुत्तै
- तुम्हारे मन में क्या था
- सॊल्लादु ऒऴियीर्
- तुम वादे करना कभी बन्द नहीं करते
- सॊऩ्ऩबोदिऩाल् वारीर्
- अपने बताए समय पर कभी नहीं आते
पेरिय तिरुमोळि 10.8.8 · चार हज़ार में 1929वाँ पाशुर
अर्थ
ओ पवित्र प्रभु, जिन्होंने कूदकर नाचते सर्प को पकड़ा और उसे नचाया! इन दिनों हम तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं; तुम्हारी तो कितनी ही योग्य रानियाँ हैं। हाय! यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- आडु अरवम् पिडित्तु आट्टुम्
- जिन्होंने नाचते सर्प कालिय को पकड़कर नचाया
- पुऩिदीर्
- ओ पवित्र प्रभु
- एदॊऩ्ऱुम् अल्लोम्
- हम कुछ भी नहीं
- तक्कार् पलर् तेविमार्
- अनेक योग्य रानियाँ
- ऎक्के
- हाय!
पेरिय तिरुमोळि 10.8.9 · चार हज़ार में 1930वाँ पाशुर
अर्थ
नाचते-झूमते तुम युवा ग्वालिनों के साथ चले गए और कुरवै के घेरा-नृत्य में हाथ मिलाए, ओ कोमल बालक! और इस बीच महान श्री और भूदेवी तुम्हें खोजती खड़ी हैं। ओ सखी, यह क्या है? यह क्या है? यह सब क्या है?
शब्दशः
- आय् मडवारॊडु
- युवा ग्वालिनों के साथ
- कुरवै पिणै
- कुरवै के घेरा-नृत्य में हाथ मिलाए
- कोमळप् पिळ्ळाय्
- ओ कोमल बालक
- तिरु मा मगळ् मण्मगळ्
- महान श्री और भूदेवी
- एडि
- ओ सखी, एक कन्या की अपनी सहेली को पुकार
पेरिय तिरुमोळि 10.8.10 · चार हज़ार में 1931वाँ पाशुर
अर्थ
यह माला बताती है कि कैसे एक ग्वालिन रात में पंखुड़ियों वाले कमल-सी आँखों वाले प्रभु से रूठी। चट्टान-से भरे और मज़बूत कन्धों वाले कलियन्, तिरुमङ्गै आळ्वार्, ने इसे रचा। जो इसका पाठ करके उनकी स्तुति करते हैं, वे दुःख से मुक्त होंगे।
शब्दशः
- अल्लिक् कमलक् कण्णऩै
- पंखुड़ियों वाले कमल-सी आँखों वाले प्रभु को
- ऎल्लिप् पॊऴुदु
- रात में
- ऊडिय ऊडल्
- रूठना, प्रेमियों की तकरार
- कल्लिऩ् मलि तोळ्
- चट्टान-से भरे और मज़बूत कन्धे
- तुक्कम् इलरे
- दुःख से मुक्त होंगे
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।