परम्परा के अनुसार, पोय्गै आळ्वार् काञ्चीपुरम के तिरुवेक्का दिव्यदेश में, यथोक्तकारी पेरुमाळ् के मन्दिर-सरोवर में एक स्वर्ण कमल में प्रकट हुए। तमिल में पोय्गै का अर्थ सरोवर है, इसीलिए वे पोय्गै आळ्वार् कहलाए। लगातार तीन दिनों में प्रकट हुए तीन मुदल् आळ्वारों (प्रथम आळ्वारों) में वे पहले हैं।
तिरुक्कोवलूर में एक अँधेरी, बरसाती रात को पोय्गै आळ्वार् ने एक मुनि के आश्रम के सामने के सँकरे गलियारे में आश्रय लिया। वहाँ केवल एक व्यक्ति के लेटने भर की जगह थी। भूतत्ताळ्वार् आए और आश्रय माँगा, तो दोनों बैठ गए। फिर पेयाळ्वार् आए, और तीनों साथ-साथ खड़े हो गए। तभी अँधेरे में उन्हें लगा कि कोई चौथा उनके बीच सिमटकर आ रहा है। वे स्वयं तिरुक्कोवलूर के त्रिविक्रम पेरुमाळ् थे, जो अपने भक्तों से दूर नहीं रह सके।
कौन आया है, यह देखने के लिए पोय्गै आळ्वार् ने दीप जलाया और गाने लगे। उनकी मुदल् तिरुवन्दादि (100 पाशुर) सारे संसार को ही दीप बनाकर जलाने से आरम्भ होती है (मुदल् तिरुवन्दादि 1)। यह अन्दादि शैली है: हर पाशुर उसी शब्द से शुरू होता है जिस पर पिछला समाप्त हुआ — जैसे माला का हर फूल अगले फूल को थामे हो। यह उन प्रभु की स्तुति करती है जिन्होंने अपने चरणों से लोकों को नापा और जो हर जीव के एकमात्र शरण हैं।
मुदल् आळ्वारों की तीनों तिरुवन्दादियों से नालायिर दिव्य प्रबन्ध का तीसरा सहस्र, इयर्पा, आरम्भ होता है। सम्प्रदाय इन तीनों को उन्हीं के रूप में स्मरण करता है जिन्होंने वह पहला दीप जलाया, जिसके प्रकाश में बाद के सभी आळ्वार् और आचार्य चले।
सभी पाशुर
पोय्गै आळ्वार् ने 100 पाशुर गाए। हर पाशुर यहाँ अंग्रेज़ी अक्षरों में है, सरल अर्थ और मुख्य शब्दों के अर्थ के साथ।