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श्रीमते रामानुजाय नमः
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तिरुप्पावै 21

आण्डाळ् की रचना · चार हज़ार में 494वाँ पाशुर

तिरुप्पावै 21 · चार हज़ार में 494वाँ पाशुर

एऱ्ऱ कलंगळ् ऎदिर् पॊंगि मीदु अळिप्पमाऱ्ऱादे पाल् सॊरियुम् वळ्ळऱ् पॆरुम् पशुक्कळ्आऱ्ऱप् पडैत्ताऩ् मगऩे अऱिवुऱाय्ऊऱ्ऱम् उडैयाय् पॆरियाय् उलगिऩिल्तोऱ्ऱमाय् निऩ्ऱ सुडरे तुयिल् ऎऴाय्माऱ्ऱार् उऩक्कु वलि तॊलैंदु उऩ् वाशऱ्कण्आऱ्ऱादु वंदु उऩ् अडिबणियुमा पोलेपोऱ्ऱि याम् वंदोम् पुगऴ्ंदु-एलोर् ऎंबावाय्

अर्थ

उन व्यक्ति के पुत्र, जिनके पास अनगिनत विशाल, उदार गायें हैं, जो बिना रुके इतना दूध देती हैं कि उनके नीचे रखे पात्र छलक जाते हैं, जागो! हे दृढ़ प्रभु, महान प्रभु, इस संसार में प्रकट हुई ज्योति, जागो! जैसे तुम्हारे शत्रु, बल चुक जाने पर, असहाय होकर तुम्हारे द्वार पर आते हैं और तुम्हारे चरणों में झुकते हैं, वैसे ही हम तुम्हारी स्तुति करती हुई आई हैं।

शब्दशः

एऱ्ऱ कलंगळ्
उनके नीचे रखे पात्र
ऎदिर् पॊंगि मीदु अळिप्प
भरते-भरते छलकते हुए
आऱ्ऱप् पडैत्ताऩ् मगऩे
हे इतनी गायों के स्वामी नन्दगोप के पुत्र
ऊऱ्ऱम् उडैयाय्
हे दृढ़ प्रभु
तोऱ्ऱमाय् निऩ्ऱ सुडरे
हे इस संसार में प्रकट हुई ज्योति
वलि तॊलैंदु
उनका बल चुक जाने पर
अडिबणियुमा पोले
जैसे वे तुम्हारे चरणों में झुकते हैं
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।