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श्रीमते रामानुजाय नमः
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तिरुप्पावै 18

आण्डाळ् की रचना · चार हज़ार में 491वाँ पाशुर

तिरुप्पावै 18 · चार हज़ार में 491वाँ पाशुर

उंदु मद कळिऱ्ऱऩ् ओडाद तोळ्-वलियऩ्नंद कोबालऩ् मरुमगळे नप्पिऩ्ऩाय्कंदम् कमऴुम् कुऴली कडै तिऱवाय्वंदु ऎंगुम् कोऴि अऴैत्तऩ काण् मादविप्पंदर्मेल् पल्गाल् कुयिल्-इऩंगळ् कूविऩ काण्पंदार् विरलि उऩ् मैत्तुऩऩ् पेर् पाडच्सॆंदामरैक् कैयाल् सीर् आर् वळै ऒलिप्पवंदु तिऱवाय् मगिऴ्ंदु-एलोर् ऎंबावाय्

अर्थ

हे नप्पिन्नै, नन्दगोपाल की पुत्रवधू, जिनके पास बल से उमड़ते हाथी हैं और जिनके कंधे युद्ध में कभी पीछे नहीं मुड़ते! हे सुगन्धित केशों वाली देवी, द्वार खोलो! देखो, मुर्गे निकलकर हर ओर बाँग दे चुके हैं, और कोयलों के झुंड माधवी के कुंज पर बार-बार गा चुके हैं। हे उँगलियों में गेंद थामे कन्या, ताकि हम तुम्हारे प्रियतम का नाम गा सकें, प्रसन्न होकर आओ और अपनी सुन्दर चूड़ियाँ खनकाते हुए अपने लाल-कमल जैसे हाथों से द्वार खोलो।

शब्दशः

उंदु मद कळिऱ्ऱऩ्
जिनके पास मद में उमड़ते हाथी हैं
ओडाद तोळ्-वलियऩ्
जिनके बलवान कंधे कभी पीछे नहीं हटते
नप्पिऩ्ऩाय्
हे नप्पिन्नै, कृष्ण की प्रिया
कंदम् कमऴुम् कुऴली
हे सुगन्धित केशों वाली देवी
मादविप्
माधवी लता
पंदार् विरलि
हे उँगलियों में गेंद थामे कन्या
मैत्तुऩऩ्
तुम्हारे ममेरे भाई और प्रियतम, कृष्ण
सीर् आर् वळै ऒलिप्प
तुम्हारी सुन्दर चूड़ियाँ खनकाते हुए
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।