तिरुप्पावै 11 · चार हज़ार में 484वाँ पाशुर
कऱ्ऱुक् कऱवैक् कणंगळ् पल कऱंदुसॆऱ्ऱार् तिऱल् अऴियच् चॆऩ्ऱु सॆरुच् चॆय्युम्कुऱ्ऱम् ऒऩ्ऱु इल्लाद कोवलर्दम् पॊऱ्कॊडियेपुऱ्ऱरवु-अल्गुऱ् पुऩमयिले पोदराय्सुऱ्ऱत्तुत् तोऴिमार् ऎल्लारुम् वंदु निऩ्मुऱ्ऱम् पुगुंदु मुगिल्वण्णऩ् पेर् पाडच्सिऱ्ऱादे पेशादे सॆल्वप् पॆंडाट्टि नीऎऱ्ऱुक्कु उऱंगुम् पॊरुळ्?-एलोर् ऎंबावाय्
अर्थ
हे उन निर्दोष ग्वालों की स्वर्ण-लता, जो झुंड पर झुंड गायें दुहते हैं और शत्रुओं का बल तोड़ते हुए युद्ध में जाते हैं! हे वन की मोरनी, पतली कमर वाली, बाहर आओ! तुम्हारे सारे स्वजन और सखियाँ तुम्हारे आँगन में आकर वर्षा-मेघ के वर्ण वाले प्रभु का नाम गा रहे हैं। फिर भी तुम न हिलती हो, न बोलती हो, हे प्यारी कन्या। तुम क्यों सो रही हो, और इसका क्या अर्थ है?
शब्दशः
- कऱवैक् कणंगळ्
- दुधारू गायों के झुंड
- सॆऱ्ऱार् तिऱल् अऴियच्
- अपने शत्रुओं का बल तोड़ते हुए
- कोवलर्दम् पॊऱ्कॊडिये
- हे ग्वालों की स्वर्ण-लता
- पुऩमयिले
- हे वन की मोरनी
- मुगिल्वण्णऩ्
- वर्षा-मेघ के वर्ण वाले प्रभु
- सिऱ्ऱादे पेशादे
- बिना हिले, बिना बोले
- सॆल्वप् पॆंडाट्टि
- हे प्यारी, भाग्यशाली कन्या
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।