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श्रीमते रामानुजाय नमः
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13

दशक 13 · 10 पाशुर

नाच्चियार् तिरुमोळि 13.1 · चार हज़ार में 627वाँ पाशुर

कण्णऩ् ऎऩ्ऩुम् करुंदॆय्वम्काट्चिप् पऴगिक् किडप्पेऩैप्पुण्णिऱ् पुळिप् पॆय्दाऱ् पोलप्पुऱम् निऩ्ऱु अऴगु पेशादेपॆण्णिऩ् वरुत्तम् अऱियादपॆरुमाऩ् अरैयिऱ् पीदगवण्ण आडै कॊंडु ऎऩ्ऩैवाट्टम् तणिय वीशीरे

अर्थ

(लालसा से अधमरी-सी आण्डाळ् अपने को फिर से जीवित करने के लिए प्रभु की वस्तुएँ माँगती हैं।) मैं यहाँ पड़ी हूँ, कण्णन् कहलाने वाले उस साँवले भगवान को देखने की अभ्यस्त होकर। बाहर खड़े होकर मीठी-मीठी बातें मत करो; यह घाव पर खट्टा रस डालने जैसा है। जो प्रभु स्त्री की पीड़ा कुछ नहीं जानते, उनकी कमर का पीला रेशम लाओ और उससे मुझे पंखा झलो, ताकि मेरा मुरझाना कुछ कम हो।

शब्दशः

कण्णऩ् ऎऩ्ऩुम् करुंदॆय्वम्
कण्णन् कहलाने वाले साँवले भगवान, कृष्ण
पुण्णिऱ् पुळिप् पॆय्दाऱ् पोल
घाव पर खट्टा रस डालने जैसा
अऴगु पेशादे
मीठी-मीठी बातें मत करो
पॆण्णिऩ् वरुत्तम् अऱियाद
जो स्त्री की पीड़ा कुछ नहीं जानते
पीदग वण्ण आडै
पीला रेशमी वस्त्र
वाट्टम् तणिय वीशीरे
मुझे पंखा झलो, ताकि मेरा मुरझाना कम हो
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.2 · चार हज़ार में 628वाँ पाशुर

पाल्-आलिलैयिल् तुयिल् कॊंडपरमऩ् वलैप्पट्टु इरुंदेऩैवेलाल् तुऩ्ऩम् पॆय्दाऱ् पोल्वेंडिऱ्ऱु ऎल्लाम् पेशादेकोलाल् निरैमेय्त्तु आयऩाय्क्कुडंदैक् किडंद कुडम्-आडिनीलार् तण्णन् तुऴाय् कॊंडु ऎऩ्नॆऱि मॆऩ् कुऴल्मेल् सूट्टिरे

अर्थ

मैं उन परम प्रभु के जाल में फँसी हूँ, जो एक कोमल वटपत्र पर सोए थे। जो मुँह में आए वह मत कहो; यह भाले से घाव सीने जैसा है। उन्होंने ग्वाले बनकर लाठी से झुंड चराए; वे घड़ों के साथ नाचते हैं; वे तिरुक्कुडन्दै में शयन करते हैं। उनकी गहरी नीली, शीतल तुलसी लाओ और मेरे कोमल, घुँघराले केशों पर रख दो।

शब्दशः

पाल्-आलिलैयिल्
एक कोमल वटपत्र पर
वलैप्पट्टु
जाल में फँसी
वेलाल् तुऩ्ऩम् पॆय्दाऱ् पोल्
भाले से घाव सीने जैसा
कोलाल् निरैमेय्त्तु
लाठी से झुंड चराते हुए
कुडंदैक् किडंद
जो तिरुक्कुडन्दै में शयन करते हैं
नॆऱि मॆऩ् कुऴल्मेल्
मेरे कोमल, घुँघराले केशों पर
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.3 · चार हज़ार में 629वाँ पाशुर

कंजैक् काय्ंद करुविल्लिकडैक्कण् ऎऩ्ऩुम् सिऱैक्कोलाल्नॆंजु ऊडुरुव वेवुंडुनिलैयुम् तळर्ंदु नैवेऩैअंजेल् ऎऩ्ऩाऩ् अवऩ् ऒरुवऩ्अवऩ् मार्वु अणिंद वऩमालैवंजियादे तरुमागिल्मार्विऱ् कॊणर्ंदु पुरट्टीरे

अर्थ

कंस पर क्रोध से जलने वाले धनुषधारी साँवले प्रभु ने अपनी तिरछी चितवन का पंखदार बाण सीधे मेरे हृदय के आर-पार चला दिया; मैं झुलसी हुई हूँ, डगमगा रही हूँ और क्षीण होती जा रही हूँ। और केवल वही मुझसे नहीं कहेंगे, “डरो मत।” यदि वे मुझे छले बिना अपनी छाती को सजाने वाली वनमाला दे दें, तो उसे लाकर मेरे वक्ष पर फेर दो।

शब्दशः

कंजैक् काय्ंद
जो कंस पर क्रोध से जले
करुविल्लि
धनुषधारी साँवले प्रभु
कडैक्कण् ऎऩ्ऩुम् सिऱैक्कोलाल्
अपनी तिरछी चितवन के पंखदार बाण से
अंजेल् ऎऩ्ऩाऩ्
नहीं कहेंगे, डरो मत
वऩमालै
वनमाला, वन के फूलों की माला
वंजियादे
मुझे छले बिना
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.4 · चार हज़ार में 630वाँ पाशुर

आरे उलगत्तु आऱ्ऱुवार्?आयर्-पाडि कवर्ंदु उण्णुम्कारेऱु उऴक्क उऴक्कुंडुतळर्ंदुम् मुऱिंदुम् किडप्पेऩैआरावमुदम् अऩैयाऩ् तऩ्अमुद वायिल् ऊऱियनीर्दाऩ् कॊणर्ंदु पुलरामेपरुक्कि इळैप्पै नीक्कीरे

अर्थ

इस जगत में ऐसी पीड़ा कौन सह सकता है? आयर्पाडि में धावा बोलकर मक्खन खाने वाले साँवले साँड ने मुझे रौंद डाला है, और मैं थकी-टूटी पड़ी हूँ। वे ऐसे अमृत हैं जिससे मन कभी नहीं भरता। उनके अमृत-से मुख में उमड़ने वाला जल लाओ और मेरे सूख जाने से पहले मुझे पिला दो, और मेरी थकान दूर कर दो।

शब्दशः

आरे उलगत्तु आऱ्ऱुवार्?
जगत में यह कौन सह सकता है?
कवर्ंदु उण्णुम्
जो धावा बोलकर खाते हैं
कारेऱु
साँवला साँड, कृष्ण
आरावमुदम्
ऐसा अमृत जिससे मन कभी नहीं भरता
अमुद वायिल् ऊऱिय नीर्
उनके अमृत-से मुख में उमड़ने वाला जल
इळैप्पै नीक्कीरे
मेरी थकान दूर करो
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.5 · चार हज़ार में 631वाँ पाशुर

अऴिलुम् तॊऴिलुम् उरुक् काट्टाऩ्अंजेल् ऎऩ्ऩाऩ् अवऩ् ऒरुवऩ्तऴुवि मुऴुशिप् पुगुंदु ऎऩ्ऩैच्सुऱ्ऱिच् चुऴऩ्ऱु पोगाऩाल्तऴैयिऩ् पॊऴिल्वाय् निरैप् पिऩ्ऩेनॆडुमाल् ऊदि वरुगिऩ्ऱकुऴलिऩ् तॊळैवाय् नीर् कॊंडुकुळिर मुगत्तुत् तडवीरे

अर्थ

चाहे मैं रोऊँ या पूजा करूँ, वे अपना रूप नहीं दिखाते; वे मुझसे नहीं कहेंगे, “डरो मत।” फिर भी उन्होंने मुझे आलिंगन में लिया है, मुझमें डूबकर प्रवेश कर लिया है, और मेरे भीतर घूमते-चक्कर लगाते रहते हैं, जाते ही नहीं। इसलिए उस बाँसुरी के छिद्रों का जल लाओ, जिसे ऊँचे माल् पत्तों भरे कुंजों से होकर झुंडों के पीछे आते हुए बजाते हैं, और उसे मेरे मुख पर शीतलता से मल दो।

शब्दशः

अऴिलुम् तॊऴिलुम्
चाहे मैं रोऊँ या पूजा करूँ
उरुक् काट्टाऩ्
वे अपना रूप नहीं दिखाते
सुऱ्ऱिच् चुऴऩ्ऱु
घूमते-चक्कर लगाते हुए
तऴैयिऩ् पॊऴिल्वाय्
पत्तों भरे कुंजों से होकर
नॆडुमाल्
ऊँचे माल्, प्रभु
कुऴलिऩ् तॊळैवाय् नीर्
उनकी बाँसुरी के छिद्रों का जल
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.6 · चार हज़ार में 632वाँ पाशुर

नडै ऒऩ्ऱु इल्ला उलगत्तुनंदगोबऩ् मगऩ् ऎऩ्ऩुम्कॊडिय कडिय तिरुमालाल्कुळप्पुक्कूऱु कॊळप्पट्टुपुडैयुम् पॆयरगिल्लेऩ् नाऩ्पोऴ्क्कऩ् मिदित्त अडिप्पाट्टिल्पॊडित्ताऩ् कॊणर्ंदु पूशीर्गळ्पोगा उयिर् ऎऩ् उडंबैये

अर्थ

मर्यादा न जानने वाले इस जगत में, नन्दगोप का पुत्र कहलाने वाले उस निर्दयी, कठोर तिरुमाल् ने मुझे मानो खुरों तले रौंदकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। मैं करवट तक नहीं बदल सकती। जहाँ-जहाँ वे चले हैं, उन पदचिह्नों की धूल लाओ और मेरे शरीर पर मल दो, ताकि मेरे प्राण मुझे छोड़कर न जाएँ।

शब्दशः

नडै ऒऩ्ऱु इल्ला उलगत्तु
मर्यादा न जानने वाले इस जगत में
नंदगोबऩ् मगऩ्
नन्दगोप का पुत्र
कॊडिय कडिय तिरुमालाल्
निर्दयी, कठोर तिरुमाल् द्वारा
पुडैयुम् पॆयरगिल्लेऩ्
मैं करवट तक नहीं बदल सकती
पॊडित्ताऩ्
धूल
पोगा उयिर्
ताकि मेरे प्राण न जाएँ
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.7 · चार हज़ार में 633वाँ पाशुर

वॆऱ्ऱिक् करुळक् कॊडियाऩ्दऩ्मीमीदु आडा उलगत्तुवॆऱ्ऱ वॆऱिदे पॆऱ्ऱ ताय्वेंबे आग वळर्त्ताळेकुऱ्ऱम् अऱ्ऱ मुलैदऩ्ऩैक्कुमरऩ् कोलप् पणैत्तोळोडुअऱ्ऱ कुऱ्ऱम् अवै तीरअणैय अमुक्किक् कट्टीरे

अर्थ

इस जगत में, जहाँ विजयी गरुड की ध्वजा वाले प्रभु की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं हिलता, मुझे जन्म देने वाली माँ ने मुझे व्यर्थ ही पाला, और वह मेरे लिए नीम-सा कड़वा हो गया। इन स्तनों में कोई दोष नहीं, सिवा उनसे बिछुड़े रहने के दोष के। उस दोष को मिटाने के लिए इन्हें उस राजकुमार के सुंदर, चौड़े कंधों से सटाकर बाँध दो।

शब्दशः

वॆऱ्ऱिक् करुळक् कॊडियाऩ्
विजयी गरुड की ध्वजा वाले प्रभु
वॆऱ्ऱ वॆऱिदे
सब व्यर्थ
वेंबे आग
नीम-सा कड़वा
कुमरऩ्
राजकुमार, बाल कृष्ण
कोलप् पणैत्तोळोडु
उनके सुंदर, चौड़े कंधों से
अऱ्ऱ कुऱ्ऱम्
उनसे बिछुड़े रहने का दोष
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.8 · चार हज़ार में 634वाँ पाशुर

उळ्ळे उरुगि नैवेऩैउळळो इलळो ऎऩ्ऩादकॊळ्ळै कॊळ्ळिक् कुऱुंबऩैक्कोवर्त्तऩऩैक् कंडक्काल्कॊळ्ळुम् पयऩ् ऒऩ्ऱु इल्लादकॊंगैदऩ्ऩैक् किऴंगोडुम्अळ्ळिप् पऱित्तिट्टु अवऩ् मार्विल्ऎऱिंदु ऎऩ् अऴलैत् तीर्वेऩे

अर्थ

मैं भीतर ही भीतर पिघलकर क्षीण हो रही हूँ, और वे कभी पूछते तक नहीं, “वह जीवित है या नहीं?” वे लूटने वाले, जलाने वाले छलिया, पर्वत उठाने वाले गोवर्धन! यदि मैं उन्हें देख लूँ, तो इन स्तनों को, जिन्हें कुछ भी नहीं मिला, जड़ से उखाड़कर उनकी छाती पर फेंक दूँगी, और यूँ अपने भीतर की आग बुझा लूँगी।

शब्दशः

उळ्ळे उरुगि नैवेऩै
भीतर ही भीतर पिघलकर क्षीण होती मैं
उळळो इलळो
वह जीवित है या नहीं?
कॊळ्ळै कॊळ्ळिक् कुऱुंबऩै
लूटने वाले, जलाने वाले छलिया
कोवर्त्तऩऩै
गोवर्धन, जिन्होंने पर्वत उठाया
कॊळ्ळुम् पयऩ् ऒऩ्ऱु इल्लाद
जिन्हें कुछ भी नहीं मिला
ऎऩ् अऴलैत् तीर्वेऩे
मैं अपनी आग बुझा लूँगी
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.9 · चार हज़ार में 635वाँ पाशुर

कॊम्मै मुलैगळ् इडर् तीरक्कोविंदऱ्कु ओर् कुऱ्ऱेवल्इम्मैप् पिऱवि सॆय्यादेइऩिप् पोय्च् चॆय्युम् तवम्दाऩ् ऎऩ्?सॆम्मै उडैय तिरुमार्विल्सेर्त्ताऩेऩुम् ऒरु ञाऩ्ऱुमॆय्म्मै सॊल्लि मुगम् नोक्किविडैदाऩ् तरुमेल् मिग नऩ्ऱे

अर्थ

यदि इसी जन्म में मैं गोविन्द की कोई छोटी-सी सेवा न कर सकूँ, जिससे मेरे भरे हुए स्तनों की पीड़ा मिट जाए, तो बाद में जाकर किया गया कोई भी तप किस काम का? या तो वे मुझे एक दिन के लिए ही सही, अपनी सुंदर छाती से लगा लें; नहीं तो, यदि वे मेरे मुख की ओर देखकर सच कह दें और मुझे विदा कर दें, तो वह भी बहुत अच्छा होगा।

शब्दशः

कॊम्मै मुलैगळ्
भरे हुए स्तन
कुऱ्ऱेवल्
एक छोटी-सी, अंतरंग सेवा
इम्मैप् पिऱवि
यही जन्म
तवम्दाऩ् ऎऩ्?
तप किस काम का?
सॆम्मै उडैय तिरुमार्विल्
उनकी सुंदर छाती पर
विडैदाऩ् तरुमेल्
यदि वे मुझे विदा कर दें
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नाच्चियार् तिरुमोळि 13.10 · चार हज़ार में 636वाँ पाशुर

अल्लल् विळैत्त पॆरुमाऩैआयर्बाडिक्कु अणि-विळक्कैविल्लि पुदुवैनगर् नंबिविट्टुशित्तऩ् वियऩ् कोदैविल्लैत् तॊलैत्त पुरुवत्ताळ्वेट्कै उऱ्ऱु मिग विरुंबुम्सॊल्लैत् तुदिक्क वल्लार्गळ्तुऩ्बक् कडलुळ् तुवळारे

अर्थ

जिन प्रभु ने उन्हें ऐसी पीड़ा दी, वे आयर्पाडि के उज्ज्वल दीप हैं। विल्लिपुत्तूर् नगर के पूर्ण पुरुष विष्णुचित्त की यशस्विनी पुत्री गोदा ने, जिनकी भौहें धनुष को भी मात देती हैं, उनके लिए गहरी लालसा और चाह में ये वचन कहे। जो इन्हें स्तुति में गा सकें, वे कभी दुःख के सागर में नहीं डूबेंगे।

शब्दशः

अल्लल् विळैत्त पॆरुमाऩै
जिन प्रभु ने उन्हें पीड़ा दी
आयर्बाडिक्कु अणि-विळक्कै
आयर्पाडि का उज्ज्वल दीप
वियऩ् कोदै
यशस्विनी गोदा
विल्लैत् तॊलैत्त पुरुवत्ताळ्
जिनकी भौहें धनुष को मात देती हैं
तुऩ्बक् कडलुळ्
दुःख के सागर में
तुवळारे
कभी नहीं डूबेंगे
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पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।