पराशर भट्टर् श्री रामानुज के सबसे प्रिय शिष्य कूरत्ताळ्वान् और उनकी धर्मपत्नी के पुत्र थे, जिनका नाम भी आण्डाळ् था। परम्परा के अनुसार, एक वर्षा की रात श्रीरंगनाथ की अपनी रसोई से इस दम्पति को प्रसाद भेजा गया, और कुछ समय बाद उनके यहाँ यह पुत्र जन्मा। कहा जाता है कि श्रीरंगनाथ और श्री रंगनायकी तायार् ने उन्हें अपनी सन्तान की तरह माना। आळवन्दार् की एक इच्छा पूरी करते हुए श्री रामानुज ने उनका नाम पराशर रखा और उनके पालन का दायित्व एम्बार् को सौंपा।
बचपन से ही भट्टर् तीव्र बुद्धि और निर्भय थे। परम्परा बताती है कि एक अभिमानी विद्वान बड़ी शोभायात्रा के साथ श्रीरंगम् से गुज़र रहे थे। गली में खेल रहे नन्हे भट्टर् ने मुट्ठी भर रेत दिखाकर पूछा कि इसमें कितने कण हैं। जब विद्वान उत्तर न दे सके, तो बालक ने मुस्कुराकर कहा कि आप कम से कम "एक मुट्ठी" तो कह ही सकते थे। विद्वान का अभिमान पिघल गया।
भट्टर् अपने समय के अग्रणी आचार्य बने, और श्रीरंगम् में उनके प्रवचन भगवान के कल्याण गुणों के आनन्द से छलकते थे। रामानुज की इच्छा थी कि तिरुनारायणपुरम् के महान वेदान्ती माधव सम्प्रदाय में आएँ। भट्टर् वहाँ गए और शास्त्रार्थ तथा अपनी कोमल कृपा से उनका हृदय जीत लिया। माधव उनके शिष्य बने और नञ्जीयर् कहलाए।
भट्टर् ने श्रीरंगनाथ की स्तुति में श्री रंगराज स्तवम्, तायार् की स्तुति में श्री गुणरत्न कोशम्, विष्णु सहस्रनाम पर अपना भाष्य भगवद्गुण दर्पणम्, और तीन रहस्यों पर अष्टश्लोकी की रचना की।