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श्रीमते रामानुजाय नमः
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नञ्जीयर्

वे महान विद्वान जिन्हें भट्टर् सम्प्रदाय में लाए, और जिन्होंने तिरुवाय्मोळि पर ओन्बदिनायिरप्पडि व्याख्यान लिखा।

नञ्जीयर् का जन्म तिरुनारायणपुरम् में माधव के रूप में हुआ। वेदान्त में वे इतने प्रसिद्ध हुए कि लोग उन्हें वेदान्ती कहने लगे। वे वेदान्त की एक अन्य धारा के अनुयायी थे और शास्त्रार्थ में विजय के लिए दूर-दूर तक जाने जाते थे।

परम्परा के अनुसार भट्टर् तिरुनारायणपुरम् आए और शास्त्रार्थ में उनसे मिले। माधव को भट्टर् के वचनों में ऐसा सत्य और ऐसी मधुरता मिली जो उन्होंने पहले कभी नहीं जानी थी, और वे उनके चरणों में गिर पड़े। भट्टर् ने उन्हें उपदेश दिया और श्रीरंगम् लौट गए। बाद में माधव संन्यास लेकर अपने आचार्य की सेवा के लिए श्रीरंगम् आए। भट्टर् ने आनन्द से उनका स्वागत किया और उन्हें "नम् जीयर्" — "हमारे जीयर्" — कहा; इस तरह वे नञ्जीयर् बने।

नञ्जीयर् ने गहरी भक्ति से भट्टर् की सेवा की और उनसे तिरुवाय्मोळि सीखा। उस पर उन्होंने नौ हज़ार पडि का व्याख्यान लिखा — ओन्बदिनायिरप्पडि — और परम्परा के अनुसार अपने जीवन में सौ बार तिरुवाय्मोळि का प्रवचन किया।

परम्परा उन्हें उनके अपने शिष्य के साथ याद करती है। अपने व्याख्यान की एक स्वच्छ प्रति बनवाने के लिए नञ्जीयर् ने पाण्डुलिपि नम्बूर् वरदर् नामक एक युवा विद्वान को दी। कावेरी पार करते समय वरदर् से वह नदी में खो गई। उन्होंने नञ्जीयर् से जो सुना था उसके आधार पर पूरा व्याख्यान फिर से लिखा, और उसमें अपने सूक्ष्म अर्थ भी जोड़े। नई प्रति देखकर नञ्जीयर् ने अन्तर पहचाना और पूछा। सारी बात सुनकर वे क्रोधित नहीं हुए, बल्कि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें "नम् पिळ्ळै" — "हमारा अपना पुत्र" — कहकर पुकारा।