श्रीरंगम् की दिव्य माता श्री रंगनायकी की स्तुति में इकसठ श्लोक, जो भट्टर् के हृदय से उमड़े; भट्टर् बचपन में दिव्य दम्पति की सन्निधि में ही पले थे।
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अर्थ
मैं श्री महालक्ष्मी के आगे हाथ जोड़कर वंदना करता हूँ। श्रीमन्नारायण सभी चर-अचर प्राणियों की सृष्टि और शासन का महान कार्य करते हैं, परंतु उस सारे कार्य को उसका प्रयोजन और फल उन्हीं की स्वीकृति-भरी दृष्टि देती है।
अर्थ
हम श्री रंगनाथ की रानी श्री की शरण लेते हैं, जो श्रीरंगम मंदिर के गर्भगृह में मंगल दीपशिखा की तरह प्रकाशित हैं। खुलती और अधमुँदी होती उनकी चितवन की लीला से ही सातों लोक अंकुरित होते हैं, सुरक्षित रहते हैं और फिर समेट लिए जाते हैं।
अर्थ
भगवान एक कल्पवृक्ष के समान हैं, जिनकी शाखाओं जैसी भुजाएँ चारों ओर फैली हैं और जो अपने से लिपटी कोमल लता का आलिंगन करने को पुलकित हैं। वह कल्पलता, श्री लक्ष्मी, जिनकी आँखें उनके फूलों पर मँडराते भौंरों जैसी हैं, अपनी कृपा-भरी दृष्टि मेरी ओर भेजें।
अर्थ
उनकी भौंह का उठना ही भगवान की रची हर वस्तु का पद और क्रम तय करता है, और उपनिषद भगवान के वक्षःस्थल पर श्री के चरणों के चिह्नों से ही उन्हें परमात्मा के रूप में पहचानते हैं। श्री के लिए भगवान का विशाल विश्वरूप भी उनके आनंद की एक छोटी-सी भूमिका मात्र है। वे श्री अपनी उन दृष्टियों से हमें ढक लें जो अमृत की लहरों से भी बढ़कर हैं।
अर्थ
आपकी महिमा इतनी विशाल है कि उसके योग्य स्तोत्र रचने की इच्छा करना भी मेरी पहुँच से बहुत दूर है; स्वयं ब्रह्मा और प्राचीन ऋषियों ने कहा, 'उनकी स्तुति करने वाले हम कौन होते हैं?' देवी, आपका सच्चा स्वरूप वाणी और मन से परे है, तो मैं कौन-से शब्द जुटाऊँ? मैं केवल इसलिए प्रयास करता हूँ कि मेरी अपनी वाणी धन्य हो जाए।
अर्थ
कवि कहते हैं कि सच्चा स्तुतिकर्ता वही है जो जिसकी स्तुति करता है उसके गुणों को प्रकट करे। तब यह कार्य सबसे बढ़कर मुझ पर ही आता है, क्योंकि आपका धैर्य, उदारता और करुणा अपनी पूरी महानता तभी दिखाते हैं जब आप मुझ जैसे व्यक्ति के दोषपूर्ण शब्दों को स्वीकार करती हैं।
अर्थ
श्री रंगनाथ की रानी श्री लक्ष्मी स्वयं अपनी मधुर दृष्टि से हमारे स्तोत्र को पूर्ण करें। तब सुनने को उत्सुक कवि शब्द और अर्थ की कुशल बुनावट के लिए इसका रस पिएँगे।
अर्थ
श्री, मेरी वाणी को अनेक प्रकार से प्रवाहित कीजिए: हर दोष से मुक्त, अच्छे गुणों से भरपूर, हृदय को प्रिय, समझने में सरल फिर भी गहरी। इसके शब्द भाइयों की तरह साथ-साथ बैठें, ताकि सुनने वाले एक क्षण भी चूके बिना इसे ग्रहण करें।
अर्थ
हे श्री रंगनाथ, श्री को भी शोभा देने वाले प्रभु, ध्यान से सुनिए: हम आपकी प्रिया श्री की आपसे भी अधिक ऊँची स्तुति करने जा रहे हैं। इसे सुनते हुए आपकी आँखें आनंद से चमक उठें, और आपकी भुजाएँ हर्ष से इतनी फूल जाएँ कि सौ कवच टूट जाएँ।
अर्थ
देवी, प्राचीन महर्षि वेद को आपके गुण-रत्नों को रखने वाली निधि-पेटिका कहते हैं। इतिहास, सही तर्क, स्मृतियाँ और पुराण उसका द्वार खोलने वाली कुंजियाँ हैं।
अर्थ
कुछ ने कहा कि वेद प्रमाण नहीं हैं, कुछ ने कि संसार का कोई शासक नहीं है, कुछ ने कि ईश्वर है पर उसमें कोई गुण नहीं, और कुछ ने तो एक भिक्षुक को ही सर्वोच्च राजा बना दिया; ये मूर्ख लोग आपस में अंतहीन लड़ते रहे। हे श्रीरंगम मंदिर के आँगन की स्वर्णलता, यह केवल इसलिए हुआ कि वे एक क्षण के लिए भी आपकी दृष्टि के दायरे में नहीं आए।
अर्थ
धन्य भक्त मन की आँख में भक्ति का अंजन लगाते हैं। उससे वे उपनिषदों में गड़ी हुई निधि की तरह छिपी आपकी महिमा को देखते और उसका आनंद लेते हैं। निश्चय ही वे ही उस दैवी संपदा के साथ जन्मे हैं जिसकी बात गीता करती है।
अर्थ
वेद आपको 'इस जगत की ईश्वरी' कहता है, और वेद की हर शाखा में श्रीसूक्त उस महिमा का विस्तार से वर्णन करता है। और जिस प्रभु को पुरुषसूक्त जगत का स्वामी बताता है, उसके बाद आने वाले अंश में उन्हें आपका ही पति घोषित किया गया है।
अर्थ
केवल एक उपनिषद ही नहीं है जो भुजाएँ उठाकर आपको सबकी ईश्वरी घोषित करता है। श्रीमद्रामायण अपना प्राण ही आपकी कथा से पाता है, और माँ, स्मृतिकारों ने इतिहास और पुराणों के द्वारा यह दिखाया कि वेद आपकी ही महिमा बताते हैं।
अर्थ
श्री रंगनाथ की प्रिये, इस संसार की सारी शक्ति के बारे में सोचिए, जो एक गाँव के मुखिया से सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर उठकर सबको धारण करने वाले तक पहुँचती है। वह सब, और जो कुछ भी ऊँचा, मंगलमय, उज्ज्वल, पवित्र और धन्य है, आपकी दृष्टि की धारा की केवल पाँच-छह बूँदें हैं।
अर्थ
एक व्यक्ति मोतियों के छत्र के नीचे मदमस्त हाथी पर सवार होता है, उसका रत्नजड़ित मुकुट झनझनाता है, और वह अपने आगे झुकते राजाओं पर ध्यान तक नहीं देता; दूसरा असहाय और दरिद्र खड़ा दाँत दिखाकर भीख माँगता है। हे श्री रंगनाथ की प्रिये, सारा अंतर इसी से है कि आपकी आँखें एक की ओर मुड़ी हैं और दूसरे से फिरी हुई हैं।
अर्थ
अमृत की सहचरी, आपकी लता जैसी भौंह जहाँ भी जाना चाहती है, प्रेम, ज्ञान, वाक्पटुता, साहस, समृद्धि, सफलता और धन सब उसी ओर दौड़ पड़ते हैं, हर एक पहले पहुँचने को उत्सुक। किनारे लाँघकर बहती नदियों की तरह वे उस व्यक्ति के पास स्वेच्छा से सेवक बनकर बह आते हैं।
अर्थ
यह संसार ऊँच-नीच से भरा है: सभी चर-अचर प्राणियों सहित ब्रह्मा, गरीब और वृक्ष, ज्ञानी बृहस्पति, बलवान और डरपोक। श्री लक्ष्मी, यह सब आपकी दृष्टि और उसके अभाव के नृत्य के सिवा कुछ नहीं है।
अर्थ
उचित समय पर, जब जीव और जड़ प्रकृति आपस में गुँथे हुए सृष्टि के लिए तैयार थे, आपके प्रियतम ने संकल्प किया। उन्होंने महाभूतों, अहंकार-तत्त्व, बुद्धि, इंद्रियों और मन को बनाया, और उनसे भूः, भुवः और सुवः लोकों को धारण करने वाले, आवरणों सहित हज़ार ब्रह्मांड रचे। श्री रंगनायकी, उन्होंने यह सब आपकी लीला के लिए किया।
अर्थ
परमपुरुष जीवों को इंद्रियों के विषय दिखाते हैं, उन्हें यह भुला देते हैं कि उनका सच्चा स्वरूप उनका दास होना है, और उन्हें त्रिगुणमयी विष्णु-माया में बहा ले जाते हैं। वे उन्हें वैसे ही थका देते हैं जैसे नर्तकी का वेश धरे किसी अभिनेता के पीछे भागते निठल्ले लोग थक जाते हैं, और श्री रंगनायकी, यह सब आपके लिए केवल एक विनोद भरा खेल है।
अर्थ
विष्णु का परमपद मन से परे और अंधकार से परे है, सदा अद्भुत है, काल से अछूता है; उसके सामने स्वर्ग भी एक कष्ट है। वहाँ जीव भगवान के आनंद में सहभागी होते हैं, और वह मेरे शब्दों की पकड़ से परे है। माँ, शास्त्र घोषित करते हैं कि वह आपके लिए ही है।
अर्थ
श्री रंगनायकी, यह सारा चर-अचर जगत आपकी लीला है, और वह ऊँचा लोक, जहाँ पवित्र नित्यसूरि सेवा करते हुए सदा भगवान के दर्शन करते हैं, आपका भोग है। केवल आपकी कृपा से जीने वाले हम हैं; परमपुरुष स्वामी हैं; और ये सब आपकी महिमा फैलाने के लिए ही हैं।
अर्थ
श्री रंगनाथ के घर की लक्ष्मी, ज्ञानी श्री वैकुंठ को आप दोनों की राजधानी जानते हैं। उसके रक्षक आज्ञा का पालन कराने में कठोर और कृपा में कोमल हैं; वह अयोध्या और अपराजिता के नाम से जानी जाती है, स्वर्गों से परे स्थित है, और अमृत बहाते अद्भुत आनंदों से भरी है।
अर्थ
श्री, कहते हैं कि वहाँ आप दोनों का, सभा-मंडपों में रत्न जैसा, एक मंडप है: इतना विशाल कि आपकी कृपा के अनुरूप हो और असंख्य जीवों को विश्राम दे सके। वह सेवा के साधन लिए आनंदमग्न सेवकों से भरा रहता है, और शार्ङ्ग धनुष, चक्र और खड्ग उसकी रक्षा करते हैं, जो प्रेम के कारण वहाँ भी पहरा देते हैं जहाँ डरने की कोई बात नहीं। वह आनंद का सागर है।
अर्थ
वहाँ आपके प्रियतम माला जैसे कोमल और सुगंधित आदिशेष को शय्या बनाकर बिछाते हैं, जिनके फनों की मणियों का प्रकाश चँदोवा बनता है, और एक छत्र के नीचे विश्व पर शासन करते हैं। अपने असंख्य गुणों से, जो शांत होते हुए भी तेजस्वी हैं, देवी, वे आपके योग्य हैं, और आप दोनों मिलकर ऐसे गहरे आनंद बाँटते हैं कि मानो एक ही हों।
अर्थ
भूदेवी, नीलादेवी और हज़ारों अन्य पत्नियाँ फूलों और चंदन की तरह आपके आनंद के साथ रहती हैं, और उमड़ती प्रेम-बाढ़ के लिए धाराओं का काम करती हैं। उनके द्वारा, मानो अपनी ही भुजाओं और आँखों के द्वारा, आप अपने प्रियतम को आनंदित करती हैं।
अर्थ
माँ, नित्यसूरि गुण, रूप, वेश, आचरण, स्वभाव और भोग में भगवान जैसे हैं, और वे सदा किसी भी दोष से मुक्त हैं। हे श्री, आपके और श्री रंगनाथ के चरणों के प्रति प्रेम से उनके हृदय इतने पिघल गए हैं कि वे विवश होकर सेवा में खिंचे चले जाते हैं, और वह सेवा ही उनका एकमात्र आनंद है।
अर्थ
चंद्रमुखी देवी, गहराई से देखें तो भगवान का स्वरूप और उनकी स्वतंत्रता भी आपके आलिंगन की महिमा से ही आते हैं। माँ, आप उनकी श्री बनीं, और यही उन्हें वह बनाता है जो वे हैं। क्योंकि आप इस प्रकार उनमें समाई हुई हैं, इसलिए वेद भी आपका अलग से वर्णन नहीं करता।
अर्थ
कमला, आपको स्पर्श करने से ही भगवान 'मंगलमय' कहलाते हैं। मंगल आपमें जोड़ी गई कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि आप स्वयं श्री हैं। सुगंध ही फूल को सुंदर बनाती है, और कोई कवि नहीं कहता कि कोई और चीज़ सुगंध को सुंदर बनाती है; उसी तरह कोई नहीं कहता कि भगवान आपको अपना सौंदर्य देते हैं।
अर्थ
जिन पर आपकी दृष्टि भरपूर ठहरती है वे परब्रह्म हैं; जो केवल दो-तीन दृष्टियाँ पाते हैं वे इंद्र और उनसे नीचे के देवता बनते हैं। इसलिए जब वेद उन दोनों की स्तुति करता है, तो वास्तव में आपकी ही स्तुति करता है, जैसे किसी राजा की राजधानी और कोष की प्रशंसा राजा की ही प्रशंसा होती है।
अर्थ
आप स्वभाव से ही श्री हैं, और विष्णु की अपनी हैं; इसलिए भले ही उनका ऐश्वर्य आप पर टिका है, उनकी महिमा किसी और पर निर्भर नहीं है। जो रत्न अपनी ही आभा से मूल्यवान है, उसे न तो मूल्यहीन कहा जाता है, न पराधीन, न यह कहा जाता है कि उसने अपना मूल्य बाहर से उधार लिया है।
अर्थ
शक्ति, बल, तेज, ज्ञान, ईश्वरत्व, विजय और यश; नमन करने वालों का स्वागत, उनसे प्रेम, और उनका भला करना; सुगंध, सौंदर्य, लावण्य और वैभव। इंदिरा, ये सारी गुण-निधियाँ आपमें और भगवान में समान रूप से हैं।
अर्थ
श्रीरंगम की मंगल-शोभा की विजय-पताका, यौवन और अन्य अनेक गुण भी आप दोनों में समान हैं। आपके गुण उनमें और उनके गुण आपमें, दर्पण की तरह, झलकते हैं, और इसलिए वे और भी अधिक मनोहर होते जाते हैं।
अर्थ
भगवती, यौवन आदि में समान होते हुए भी आप दोनों गुणों को आपस में बाँट लेते हैं: उन्हें पुरुषोचित गुण, जैसे स्वतंत्रता और शत्रुओं के विनाश में दृढ़ता; आपको स्त्रियोचित गुण, जैसे कोमलता, पतिभक्ति, करुणा और धैर्य। अपने साझे जीवन में यह भेद आप केवल एक-दूसरे का अधिक आनंद लेने के लिए करते हैं।
अर्थ
कमल में निवास करने वाली, ऐसा लगता है कि आप हरि और अपने बीच चीज़ें बाँट लेती हैं: उन्हें वर्षा के बादल का रंग, आपको सोने की आभा; उन्हें पूर्ण यौवन, आपको कोमल कौमार्य; और हर एक को उसके योग्य आभूषण। फिर आप दोनों मिलकर उनका आनंद लेते हैं।
अर्थ
आपका रूप कोमलता, शीतलता, लावण्य, मधुरता और उदारता से बुना है। क्या हम कहें कि चंद्रमा, कल्पलता और अमृत, जो आपके साथ क्षीरसागर से निकले, आपको अपना सार देकर खोखले छिलके रह गए? श्री रंगनायकी, ऐसी उलझी हुई उपमाएँ आपके दिव्य रूप पर नहीं जँचतीं, जिसे कोई भी 'बनाया हुआ' नहीं कह सकता।
अर्थ
आपका श्रेष्ठ रूप आगे झुकता है, आपके आगे नमन करने वालों को उत्तर देने को उत्सुक, और एक ओर झुकता है, अपने प्रियतम की सेवा को लालायित। सोने की कसौटी पर चंपक की माला जैसा चमकता वह रूप सभी शब्दों से परे है।
अर्थ
माँ, हम हर क्षण आपको इसी प्रकार विराजमान देखें। एक चरण-कमल नीचे उतरा है ताकि मैं उसे प्रणाम कर सकूँ, और दूसरा मुड़ा हुआ है; आपका कर-कमल 'मत डरो' की अभय मुद्रा में उठा है; और आपके मधुर, सौम्य मुख पर करुणा से छलकती दृष्टियों की लहरें हैं।
अर्थ
इंदिरा, मैं आपके उन दोनों चरणों की पूजा करूँ जो कमल की पंखुड़ियों जैसे कोमल और उपनिषदों की सुगंध से सुवासित हैं। जब वे आपके प्रियतम के वक्षःस्थल पर वैजयंती माला को दबाते हैं, तो वह मानो शीतल जल छिड़कने से फिर ताज़ा हो उठती है।
अर्थ
आपकी कृपा के छोटे-से अंश से ही गर्व से फूले राजाओं की आँखें वर्णन योग्य नहीं हैं। वेद आपके स्वामी को कमलनयन केवल उनकी उन आँखों के कारण कहता है जो भौंरों की तरह आपके सौंदर्य के मधु से सदा मतवाली रहती हैं। श्री लक्ष्मी, आपकी दृष्टि की महिमा किन शब्दों में और किस स्वर में कभी कही जा सकती है?
अर्थ
पद्मा, मेरा और कोई सहारा नहीं; अपनी दृष्टि से मेरी रक्षा कीजिए। वह दृष्टि आनंद-स्वरूप है; वह भगवान को भी आनंद से विभोर कर देती है; वह प्रेम से और मुझ जैसे लोगों को डुबो देने वाली कृपा से छलकती है; और उसकी एक बूँद भी किसी को ब्रह्मा के पद तक उठाने के लिए पर्याप्त है।
अर्थ
माँ, कमल का पराग भी आपके चरणों को चुभता है; जब आपकी सखियाँ आपको बहुत उत्सुकता से निहारती हैं तो आपका शरीर कुम्हला जाता है; एक लीला-कमल पकड़ना भी आपके लिए साहस का काम है; और जब आप हरि की भुजा पर वनमाला में झूलती हैं, तो हम पुकार उठते हैं, 'हाय, कितना कठिन!' तो फिर इतना कोमल आपका शरीर मेरे शब्दों का कठोर दबाव कैसे सहेगा?
अर्थ
आपका रूप सदा बाल्य और यौवन के संधि-स्थल पर रहता है। वह स्वाभाविक संधि आपके अंगों को अपनी ही एक सुगंध देती है, और आपके प्रियतम स्वयं, हाथ पकड़कर सिखाने वाले गुरु की तरह, आपको साझे आनंद की धारा में ले जाते हैं।
अर्थ
श्री रंगनायकी, आपका कोमल शरीर फूलों की माला जैसा है: अद्भुत सुगंध वाला, यौवन से खिला, कभी न मुरझाने वाला, सौंदर्य के अमृत से शीतल और लावण्य के धागे में पिरोया हुआ। वह केवल आपके प्रियतम के वक्षःस्थल पर धारण किए जाने योग्य है, किसी कवि के शब्दों से छुए जाने योग्य नहीं। धिक्कार है मुझे कि मैं दौड़ पड़ा!
अर्थ
जैसे मधुरता जानने वाला भौंरा फूलों की माला का आनंद लेता है, वैसे ही आपके प्रियतम प्रेम-भरी लीला में आपको सँजोते हैं। इस प्रकार, देवी, आप सदा मुकुंद को आनंद देती हैं।
अर्थ
जनार्दन की प्राण, आपका शरीर स्वभाव से ही मधुर है, फिर भी सुंदर आभूषणों से शोभित है: सोने की करधनी, मोतियों के कर्णफूल, हार, माथे का आभूषण, रत्नों की लड़ियाँ और नूपुर। वे दूध में डाले गए शक्कर के टुकड़ों जैसे हैं, या कल्पलता पर खिले फूलों जैसे।
अर्थ
कौस्तुभ मणि, वैजयंती माला और पाँच दिव्य आयुध आप दोनों के आनंद के लिए आभूषण हैं, फिर भी आपके प्रियतम उन सबको स्वयं धारण करते हैं। श्रीरंगम के गर्भगृह की रत्न-मंजरी, मानो वे आपको उनके भार से बचाना चाहते हैं, और इसीलिए आपको अपने पास सटाए रखते हैं।
अर्थ
नए खिलते कमल जैसी लंबी आँखों वाली माँ, जब-जब भगवान मनुष्य या पशु के रूप में जन्म लेने की लीला करते हैं, आप भी उनके साथ उसके अनुरूप जन्म लेती हैं। यदि आप उनके साथ अवतरित न होतीं, तो उनकी दिव्य लीला की सारी मधुरता खो जाती।
अर्थ
भगवती, जब मुरारि ने समुद्र मथा, और परिश्रम से उनकी भुजाओं से कंगन और मालाएँ खिसक रही थीं, तब आप उनकी थकान मिटाने के लिए अमृत-लहरों के भँवर से प्रकट हुईं। चाँदनी की तरह आपने उन्हें अपनी मुस्कुराती आँखों के शीतल अमृत से नहला दिया।
अर्थ
माँ मैथिली, जिस क्षण राक्षसियों ने आपका अपराध किया था, उसी क्षण आपने उन्हें हनुमान से बचाया, और इससे आपके आगे राम का दरबार भी छोटा लगा, क्योंकि उन्होंने कौए और विभीषण की रक्षा तभी की जब उन्होंने 'शरण' पुकारा। आपकी वह क्षमा, जिसे माँगना नहीं पड़ता, हम महापापों से लदे हुओं को सांत्वना दे।
अर्थ
माँ लक्ष्मी, जैसे मिथिला के लोग राम को अपना दामाद मानते थे, वैसे ही हम भी, इस गर्व के साथ कि आपकी सेवा ही हमारा एकमात्र आनंद है, हरि को 'आपके प्रियतम, हमारे दामाद' के रूप में देखते हैं। इस लोक में और परलोक में, आपसे हमारे संबंध के द्वारा ही हम उनके दर्शन करें, उनके पास जाएँ, उनकी सेवा माँगें और उसमें आनंदित हों।
अर्थ
माँ, अपने बच्चे का भला चाहने वाले पिता की तरह, आपके प्रियतम कभी-कभी दोषों से भरे लोगों पर कठोर हो जाते हैं। तब आप उनसे पूछती हैं, 'यह क्या? इस संसार में कौन दोष-रहित है?', उचित उपायों से उनके दोष उन्हें भुला देती हैं, और उन्हें उनका अपना बना देती हैं। इसीलिए आप हमारी माँ हैं।
अर्थ
भगवान की नित्य सहचरी माँ, आप हमें बचाने के लिए इस संसार में आईं, और आपकी महिमा के प्रति बहरे इस संसार में आपने बहुत कष्ट सहे: चमेली जैसे कोमल आपके चरण पत्थरों पर घायल हुए, और आप अपने स्वामी से बिछुड़कर वन में रहीं। प्रेम-भरे क्रोध में कवि पुकार उठता है: धिक्कार है ऐसी करुणा को, और धिक्कार है आप दोनों की असीम स्वतंत्रता को!
अर्थ
मैथिली, आपके लिए भगवान समुद्र पर लेटे, उसे मथा और उस पर सेतु बाँधा; उन्होंने शिव का धनुष ऐसे तोड़ा जैसे कोई बेल तोड़ता है; उन्होंने राक्षस के दस सिर काट दिए और बिना सिर का धड़ नचा दिया। आपके पति, जिनकी एकमात्र इच्छा आपको प्रसन्न करने में चतुर होना है, क्या नहीं करेंगे?
अर्थ
कमला, आपके प्रियतम हज़ारों हाथों, पैरों, मुखों और आँखों से, अपने विश्वरूप के सारे वैभवों और उसके अनुरूप गुणों से, और अपने अनेक अवतारों से आपको आनंदित करते हैं। फिर भी कभी-कभी वे आपके सौंदर्य के भँवर में डूबकर स्वयं को खो बैठते हैं।
अर्थ
माँ, क्षीरसागर आपका जन्मस्थान है इसलिए आप उसका सम्मान करती हैं, और अपने प्रियतम के प्रेम के कारण परमपद को सँजोती हैं। फिर भी आप उन दोनों को भूलकर श्रीरंगम में और भी अधिक आनंद पाती हैं, यह सोचकर कि 'यही वह स्थान है जहाँ मैं इस जैसे लोगों की रक्षा कर सकती हूँ।'
अर्थ
माँ, उदारता, करुणा, आश्रितों के प्रति प्रेम और ऐसे सभी गुण यहाँ श्रीरंगम में अपने शिखर पर पहुँचते हैं। लोग जो कुछ और कहीं दिखाते हैं, जैसे आपका सीता-अवतार, वह इसका केवल पूर्वाभ्यास था।
अर्थ
माँ, जब कोई आपके आगे केवल हाथ जोड़ देता है, तो आप उसे धन, आत्मानंद, या परमपद तक दे देती हैं। फिर आप लजा जाती हैं, यह सोचकर कि 'मैंने इसके लिए कुछ भी योग्य नहीं किया।' बताइए, यह कैसी उदारता है?
अर्थ
देवी, मेरे पास ज्ञान, सत्कर्म या भक्ति का कोई धन नहीं है, और शरणागति के लिए आवश्यक तीव्र चाह, योग्यता, सामर्थ्य या पश्चाताप को भी मैं नहीं जानता। मैं ऐसे अपराधों का ढेर लगाता जाता हूँ जिन्हें आप दोनों भी मुश्किल से सह सकें; मूर्ख की तरह व्यवहार करते हुए मैं आप पर भारी बोझ हूँ।
अर्थ
माँ, ऐसी सौ झूठी स्वीकारोक्तियों से मैं केवल प्राचीन सत्यवादी ऋषियों की नकल कर रहा हूँ। या यूँ कहें, आपके चरण-कमलों तक पहुँचने का मुझमें अपना कोई बल नहीं है; दैवी विधान से आप ही मेरी शरण बनाई गई हैं।
अर्थ
हम अपने साथी भक्तों के साथ, कष्ट और शोक से मुक्त होकर, प्रेममयी सेवा की महान संपदा का सुख से आनंद लेते हुए, श्रीरंगम में सौ वर्ष जिएँ। हम आपके चरण-कमलों के भीतर की धूल बनें। आप ही हमारी माँ और पिता हैं, हमारा सब कुछ और हमारा मार्ग भी; आप केवल हमारी होकर रहिए, और अपनी अहैतुकी कृपा से हमें स्वीकार कीजिए।
पाठ को prapatti.com, sanskritdocuments.org, sadagopan.org से श्लोक-दर-श्लोक मिलाया गया है। अर्थ पाठक की सहायता के लिए सरल रूप में दिए गए हैं; पाठ किसी अध्यापक से सीखें।
ये पाठक की सहायता के लिए छोटे परिचय हैं; स्वयं इन ग्रन्थों का अध्ययन अपने आचार्य के अधीन करना सबसे अच्छा है।
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