नम्पिळ्ळै का मूल नाम वरदर् था; अपने परिवार के गाँव के नाम पर वे नम्बूर् वरदर् भी कहलाते हैं। तिरुमंगै आळ्वार् के प्रति उनकी गहरी भक्ति थी, इसलिए उन्हें कलिवैरि दासर् भी कहा गया। वे नञ्जीयर् से सीखने आए, और परम्परा के अनुसार जब उन्होंने नञ्जीयर् की पाण्डुलिपि कावेरी में खोकर उसे और गहरे अर्थों के साथ फिर लिखा, तब नञ्जीयर् ने प्रसन्न होकर उन्हें "नम् पिळ्ळै" — "हमारा अपना पुत्र" — कहा।
नञ्जीयर् के बाद नम्पिळ्ळै श्रीरंगम् के आचार्य बने। प्रतिदिन वे बड़ी सभाओं में तिरुवाय्मोळि को इतनी आत्मीयता और स्पष्टता से समझाते कि लोग दूर-दूर से सुनने आते। परम्परा के अनुसार एक बार नम्पेरुमाळ् स्वयं नम्पिळ्ळै के प्रवचन में जुटी भीड़ को देखने उठ खड़े हुए, और मन्दिर के एक सेवक ने विनम्रता से भगवान को याद दिलाया कि वे अपने अर्चा रूप में ही रहें।
परम्परा उनकी विनम्रता को भी याद करती है। कन्दाडै तोळप्पर् नामक एक वरिष्ठ श्रीवैष्णव ने एक बार पेरुमाळ् के सामने उनके बारे में कठोर बातें कहीं। उस रात लज्जित होकर जब वे क्षमा माँगने निकले, तो पाया कि नम्पिळ्ळै पहले से ही उनके द्वार पर खड़े हैं — यह क्षमा माँगने के लिए कि उनके कारण तोळप्पर् को अप्रसन्नता हुई। द्रवित होकर तोळप्पर् ने उन्हें लोकाचार्य — "जगत के आचार्य" — कहा, और यह नाम उनके साथ जुड़ गया।
नम्पिळ्ळै के तिरुवाय्मोळि प्रवचनों को उनके शिष्य वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने लिखा। ईडु या मुप्पत्तारायिरप्पडि नाम से प्रसिद्ध यह व्याख्यान आज भी स्वामी नम्माळ्वार् के वचनों की सम्प्रदाय की समझ का हृदय है।