तिरुवाय्मोळि 7.7.1 · चार हज़ार में 3519वाँ पाशुर
अर्थ
(नायिका अपनी सखियों और माताओं से कहती है।) क्या ये असहाय स्त्रियों के प्राण निगलने वाले दो यम हैं? मैं नहीं जानती। क्या ये प्रभु कृष्ण के पवित्र नेत्र हैं? मैं नहीं जानती। मेरे चारों ओर हर जगह ये अभी-अभी खिले कमलों जैसे दिखाई देते हैं, देखो! सखियो, माताओ, मैं क्या करूँ, मैं जो इतनी व्याकुल हूँ?
शब्दशः
- एऴैयर् आवि उण्णुम्
- जो असहाय स्त्रियों के प्राण निगलते हैं
- इणैक् कूऱ्ऱम्गॊलो?
- दो यम?
- तिरुक्कण्गळ्गॊलो?
- या उनके पवित्र नेत्र?
- सूऴवुम्
- मेरे चारों ओर हर जगह
- तामरै नाळ् मलर् पोल्
- अभी-अभी खिले कमलों की तरह
- तुयराट्टियेऩे?
- मैं जो इतनी व्याकुल हूँ
तिरुवाय्मोळि 7.7.2 · चार हज़ार में 3520वाँ पाशुर
अर्थ
माताओ, मुझे सताकर, मुझे झकझोरकर और मेरे बारे में बातें फैलाकर तुम्हें क्या मिलता है? क्या यह पास खड़े ऊँचे कल्पवृक्ष की कोई लता है? या उसकी कोमल कोंपल? मैं नहीं जानती। इकट्ठा किया हुआ मक्खन खाने वाले प्रभु की पवित्र नासिका मेरी आत्मा के भीतर वहाँ जलाए गए किसी प्रबल दीपक की लौ की तरह स्थित है; इतनी प्रबल है वह।
शब्दशः
- आट्टियुम् तूऱ्ऱियुम्
- मुझे झकझोरकर और बातें फैलाकर
- कऱ्पगत्तिऩ् वल्लियो?
- कल्पवृक्ष की कोई लता?
- कॊऴुंदो?
- या उसकी कोमल कोंपल?
- ईट्टिय वॆण्णॆय् उंडाऩ्
- वे जिन्होंने इकट्ठा किया मक्खन खाया
- तिरुमूक्कु
- उनकी पवित्र नासिका
- वल् विळक्किऩ् सुडराय्
- प्रबल दीपक की लौ की तरह
तिरुवाय्मोळि 7.7.3 · चार हज़ार में 3521वाँ पाशुर
अर्थ
क्या यह कोई रसीला, उत्तम फल है? क्या यह मुझ पापिनी का क्रूर कर्म है? क्या यह सुन्दर, गोल मूँगे का कोई चमकता टुकड़ा है? मैं नहीं जानती। ऊँचे श्यामल-नीले मेघ जैसे पवित्र शरीर वाले मेरे प्रभु के, कोवै फल जैसे लाल अधर, मेरे प्यारे प्राणों के सामने हर उस दिशा में दिखाई देते हैं जिधर मैं मुड़ सकती हूँ।
शब्दशः
- वालियदु ओर् कऩिगॊल्?
- क्या यह कोई रसीला, उत्तम फल है?
- विऩैयाट्टियेऩ् वल्विऩैगॊल्?
- या मुझ पापिनी का क्रूर कर्म?
- पवळक् कॊऴुम् तुंडम्गॊलो?
- मूँगे का कोई चमकता टुकड़ा?
- नील नॆडु मुगिल् पोल्
- ऊँचे श्यामल-नीले मेघ जैसे
- तॊंडैवाय्
- कोवै फल जैसे लाल अधर
- एलुम् तिशैयुळ् ऎल्लाम्
- हर उस दिशा में जिधर मैं मुड़ सकूँ
तिरुवाय्मोळि 7.7.4 · चार हज़ार में 3522वाँ पाशुर
अर्थ
क्या ये दो नीले धनुष हैं, जो असहाय स्त्रियों के प्यारे प्राणों को सताने के लिए उन पर तने हैं? या अमर कीर्ति वाले कामदेव मन्मथ का गन्ने का धनुष? ये तो मन्मथ के अपने पिता, प्रभु कृष्ण की भौंहें हैं। ये मेरे प्राणों पर तनी रहती हैं और मुझे सदा मारती रहती हैं।
शब्दशः
- इणै नील विऱ्कॊल्
- दो नीले धनुष?
- मदऩऩ् करुप्पुच् चिलैगॊल्
- या मन्मथ का गन्ने का धनुष?
- उयिर्त् तादै
- अपने पिता
- कण्ण पॆरुमाऩ् पुरुवम्?
- प्रभु कृष्ण की भौंहें
- ऎऩ् उयिर् मेलऩवाय्
- मेरे प्राणों पर तनी हुई
- अडुगिऩ्ऱऩ
- वे मुझे मारती रहती हैं
तिरुवाय्मोळि 7.7.5 · चार हज़ार में 3523वाँ पाशुर
अर्थ
क्या यह लाल प्रकाश से जन्मी, सदा चमकती सफ़ेद बिजली है? या मेरी आत्मा को मारने वाली मोतियों की सुन्दर लड़ी? मैं नहीं जानती। पर्वत उठाने वाले प्रभु की मुस्कान मेरी आत्मा को मार रही है। माताओ, मैं ऐसी कोई जगह नहीं जानती जहाँ मैं बच निकलूँ।
शब्दशः
- सॆय्य ईऩ् सुडर् वॆण् मिऩ्ऩुक्कॊल्?
- लाल प्रकाश से जन्मी सफ़ेद बिजली?
- अणि मुत्तम्गॊलो?
- या मोतियों की सुन्दर लड़ी?
- कुऩ्ऱम् ऎडुत्त पिराऩ् मुऱुवल्
- पर्वत उठाने वाले प्रभु की मुस्कान
- ऎऩदु आवि अडुम्
- मेरी आत्मा को मारती है
- ऎऩक्कु उय्वु इडमे
- मेरे बच निकलने की जगह
तिरुवाय्मोळि 7.7.6 · चार हज़ार में 3524वाँ पाशुर
अर्थ
क्या ये वे कोमल कोंपलें हैं जिन पर मकर कुण्डल शोभा पाते हैं, जो मानो यह कहते हुए चमक रहे हैं, 'असहाय स्त्रियों के लिए, असुरों के लिए, राक्षसों के लिए बच निकलने की जगह कहाँ है?' ये तो विषैले फणों वाले सर्प पर शयन करने वाले प्रभु के कुण्डलों सहित पवित्र कान हैं। ये मुझे मारते रहते हैं और कभी छोड़ते नहीं; देखो!
शब्दशः
- उय्वु इडम्
- बच निकलने की जगह
- मगरम् तऴैक्कुम् तळिर्गॊल्
- कोमल कोंपलें जिन पर मकर कुण्डल शोभा पाते हैं?
- पै विडप् पांबु अणैयाऩ्
- विषैले फणों वाले सर्प पर शयन करने वाले प्रभु
- तिरुक् कुंडलक् कादुगळे?
- कुण्डलों सहित उनके पवित्र कान
- कैविडल् ऒऩ्ऱुम् इऩ्ऱि
- कभी न छोड़ते हुए
तिरुवाय्मोळि 7.7.7 · चार हज़ार में 3525वाँ पाशुर
अर्थ
'देखो, माताओ!' मैं तो तुम्हें इसे दिखाने का कोई उपाय भी नहीं ढूँढ़ पाती। क्या यह ताज़ा सफ़ेद अर्धचन्द्र है? या उनसे प्रेम करने वालों के लिए विष में बुझी भाले की नोक? यह तो दूर तक फैली चार विशाल भुजाओं वाले प्रभु का पवित्र ललाट है। मेरे प्राण लेने पर तुला हुआ, यह टिका रहता है और मुझ अभागिन को मारता है।
शब्दशः
- काट्टुम् वगै अऱियेऩ्
- मैं तुम्हें दिखाने का उपाय नहीं ढूँढ़ पाती
- वॆण् तिंगळ्
- सफ़ेद अर्धचन्द्र
- नयंदार्गट्कु नच्चु इलैगॊल्
- उनसे प्रेम करने वालों के लिए विष में बुझी भाले की नोक?
- नाल् तडम् तोळ्
- चार विशाल भुजाएँ
- तिरु नुदले?
- उनका पवित्र ललाट
- उयिर् कोळ् इऴैत्ते
- मेरे प्राण लेने पर तुला हुआ
तिरुवाय्मोळि 7.7.8 · चार हज़ार में 3526वाँ पाशुर
अर्थ
क्या यह प्रकाश का कोई भरा-पूरा मण्डल है, जिसने अपने चुने हुए आभूषणों के रूप में कमल, लता, मूँगा, धनुष, शीतल मोती, कोमल कोंपलें और शीतल, उज्ज्वल अर्धचन्द्र धारण किए हैं? यह तो आभूषणों से सजा कृष्ण का उज्ज्वल मुख है, जो मुझ अभागिन के प्राण ले रहा है।
शब्दशः
- तामरैयुम् कॊडियुम्
- कमल और लता
- पवळमुम् विल्लुम्
- मूँगा और धनुष
- तण् मुत्तमुम् तळिरुम्
- शीतल मोती और कोमल कोंपलें
- कुळिर् वाऩ् पिऱैयुम्
- शीतल, उज्ज्वल अर्धचन्द्र
- कॊऴुम् सोदिवट्टम्
- प्रकाश का भरा-पूरा मण्डल
- वाळ् मुगमाय्
- उनके उज्ज्वल मुख के रूप में
- उयिर् कॊळ्गिऩ्ऱदे?
- मेरे प्राण ले रहा है
तिरुवाय्मोळि 7.7.9 · चार हज़ार में 3527वाँ पाशुर
अर्थ
क्या यह गहरे अँधेरे से सँवारकर निकाले गए, घने घुँघराले बालों में बँधे महीन नीले धागों का गुच्छा है? नहीं, ये तो अद्भुत प्रभु के केश हैं। ये खिलते, शीतल तुलसी के फूलों से सुगन्धित होकर मेरे पास आते हैं, और मेरे प्राण चुराए ले जा रहे हैं। माताओ, तुम यह नहीं जानतीं, और मुझे डाँटती ही रहती हो!
शब्दशः
- इरुळैच् चुगिर्ंदिट्ट
- अँधेरे से सँवारकर निकाले गए
- कॊऴुम् सुरुळिऩ्
- घने घुँघराले बाल
- नील नल् नूल् तऴैगॊल्?
- महीन नीले धागों का गुच्छा?
- मायऩ् कुऴल्
- अद्भुत प्रभु के केश
- पून् तण् तुऴाय् विरै नाऱ
- शीतल तुलसी के फूलों से सुगन्धित
- कळ्गिऩ्ऱवाऱु
- कैसे वे चुराते हैं
- कऴऱा निऱ्ऱिरे
- तुम मुझे डाँटती ही रहती हो
तिरुवाय्मोळि 7.7.10 · चार हज़ार में 3528वाँ पाशुर
अर्थ
'तू आँगन में बाहर खड़ी रहती है!' यह कहकर तुम हाथ मलती हो, मुझे चारों ओर से घेर लेती हो और डाँटती हो। पर मेरा मन तो उनके उस दीप्त मुकुट से एक हो गया है, जो धधकते प्रकाश वाले रत्न के रंग में इन तीनों लोकों में फैला है। माताओ, तुम अब भी मुझे रोके रखने की आशा क्यों करती हो?
शब्दशः
- निऱ्ऱि मुऱ्ऱत्तुळ्
- तू आँगन में बाहर खड़ी रहती है
- नॆरित्त कैयर् आय्
- हाथ मलते हुए
- सुऱ्ऱियुम् सूऴ्ंदुम् वैदिर्
- तुम मुझे घेरकर डाँटती हो
- सुडर्च् चोदि मणि निऱम् आय्
- धधकते रत्न के रंग में
- सुडर् मुडिक्के
- उनके दीप्त मुकुट से
- ऒऱ्ऱुमै कॊंडदु उळ्ळम्
- मेरा मन उससे एक हो गया है
- नशै ऎऩ् नुंगट्के?
- तुम अब भी आशा क्यों करती हो?
तिरुवाय्मोळि 7.7.11 · चार हज़ार में 3529वाँ पाशुर
अर्थ
ब्रह्मा, शिव और इन्द्र को आँखों से देख पाना कठिन है, फिर भी कृष्ण तो उनकी दृष्टि से भी परे हैं। कुरुगूर् के शठकोपन् ने उन पर जो विस्मयकारी सहस्र पाशुर गाए, उनमें से इन दस को भी जो गा सकें, वे गौरवशाली दिव्य जनों के साथ रहेंगे और कभी नष्ट नहीं होंगे।
शब्दशः
- कट्कु अरिय
- आँखों से देख पाना कठिन
- पिरमऩ् सिवऩ् इंदिरऩ्
- ब्रह्मा, शिव, इन्द्र
- कण्णऩैक्
- कृष्ण
- उट्कु उडै आयिरत्तुळ्
- विस्मयकारी सहस्र में से
- उट्कु उडै वाऩवरोडु
- गौरवशाली दिव्य जनों के साथ
- ऎऩ्ऱुम् मायारे
- कभी नष्ट नहीं होंगे
पाशुर पाठ: प्रोजेक्ट मदुरै का नालायिर दिव्य प्रबन्धम् का पद-विभक्त ई-पाठ, उनके दूसरे संस्करण से हर पाशुर मिलाया गया। पाशुर देवनागरी में वैसे लिखा है जैसे तमिऴ् में पढ़ा जाता है: ழ को ऴ, ற को ऱ, ன को ऩ। अर्थ आचार्यों के व्याख्यानों के प्रकाश में इस साइट के लिए लिखी गई सरल प्रस्तुतियाँ हैं, और विद्वान् की समीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।