उय्यक्कोण्डार् का जन्म श्रीरंगम् के पास तिरुवेळ्ळरै में हुआ। वहाँ के पेरुमाळ् के नाम पर उनका नाम पुण्डरीकाक्ष रखा गया। वे नाथमुनि के शिष्य बने और उनके चरणों में दिव्य प्रबन्ध और उसके अर्थ सीखे।
परम्परा के अनुसार नाथमुनि ने उन्हें योग सिखाने की बात कही — वह मार्ग जिसमें गहरे ध्यान में अकेले भगवान का अनुभव किया जाता है। पुण्डरीकाक्ष ने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने पूछा, जब आसपास के लोग भगवान को जाने बिना दुख में हैं, तब मैं अकेला आनन्द में कैसे बैठ सकता हूँ? इस उत्तर से प्रसन्न होकर नाथमुनि ने उन्हें उय्यक्कोण्डार् नाम दिया, जिसका अर्थ परम्परा यह बताती है — वह जिसके द्वारा दूसरों का उद्धार होता है।
उय्यक्कोण्डार् को किसी ग्रन्थ के लिए नहीं, बल्कि इसी करुणा के लिए और पाए हुए उपदेश को निष्ठा से आगे सौंपने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने मणक्काल् नम्बि को उपदेश दिया और नाथमुनि की इच्छा के अनुसार उनसे कहा कि जो कुछ मिला है वह सब नाथमुनि के पौत्र यामुनाचार्य तक पहुँचाएँ।