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श्रीमते रामानुजाय नमः
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मणक्काल् नम्बि

वे धैर्यवान आचार्य, जिन्होंने प्रतिदिन साग की एक छोटी-सी भेंट से युवा राजा यामुनाचार्य को फिर भगवान की ओर लौटाया।

मणक्काल् नम्बि, जिनका नाम राममिश्र था, श्रीरंगम् के पास मणक्काल् में जन्मे। वे उय्यक्कोण्डार् के शिष्य बने और अनेक वर्षों तक पूरी भक्ति से उनकी और उनके घर की सेवा करते रहे।

परम्परा एक दिन को विशेष रूप से याद करती है। उय्यक्कोण्डार् के घर की स्त्रियाँ स्नान करके लौट रही थीं, तभी रास्ते में कीचड़ आ गया। उनके पैर मैले न हों, इसलिए मणक्काल् नम्बि कीचड़ में लेट गए और उनसे अपनी पीठ पर से होकर जाने को कहा। यह सुनकर उय्यक्कोण्डार् का हृदय भर आया और उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया।

उय्यक्कोण्डार् ने उन्हें नाथमुनि के पौत्र यामुनाचार्य तक उपदेश पहुँचाने को कहा था। पर तब तक यामुनाचार्य राजा बन चुके थे और महल में रहते थे — एक निर्धन श्रीवैष्णव की पहुँच से बाहर। इसलिए मणक्काल् नम्बि प्रतिदिन चुपचाप महल के रसोइयों को तूदुवळै नाम का एक साग दे आते, जो राजा को बहुत प्रिय था, और बदले में कुछ नहीं माँगते। एक दिन उन्होंने देना बन्द कर दिया। राजा ने साग की कमी पहचानी और उसे लाने वाले को बुलवाया।

मणक्काल् नम्बि ने राजा से कहा कि उनके पितामह उनके लिए एक महान निधि छोड़ गए हैं। उन्होंने राजा को भगवद्गीता का उपदेश दिया और फिर वह निधि दिखाने श्रीरंगम् ले गए — वह निधि स्वयं श्रीरंगनाथ थे। पेरिय पेरुमाळ् के दर्शन करके यामुनाचार्य ने राज्य त्याग दिया और अपना जीवन भगवान को समर्पित कर दिया। मणक्काल् नम्बि को ग्रन्थों के लिए नहीं, इसी धैर्य और विनम्रता के लिए याद किया जाता है।