श्री रामानुज का जन्म परम्परा के अनुसार सन् 1017 में श्रीपेरुम्बुदूर् में आसूरि केशव सोमयाजी और कान्तिमती के घर हुआ। युवावस्था में उन्होंने काञ्ची में यादवप्रकाश से वेदान्त पढ़ा, पर उन्हें अक्सर लगता था कि गुरु के किए उपनिषदों के अर्थ भगवान को उनके वास्तविक स्वरूप से छोटा कर देते हैं। मतभेद बढ़ते गए और अन्ततः रामानुज ने उनका साथ छोड़ दिया।
काञ्ची में उन्होंने तिरुक्कच्चि नम्बि की सेवा की, जो प्रतिदिन वरदराज पेरुमाळ् को पंखा झलते थे और, परम्परा कहती है, उनसे बातें करते थे। तिरुक्कच्चि नम्बि के द्वारा भगवान ने रामानुज को छह उत्तर दिए, जिनसे उनके प्रश्नों का समाधान हुआ। फिर आळवन्दार् के शिष्य उनके आचार्य बने। पेरिय नम्बि ने मधुरान्तकम् में उनका पञ्च संस्कार किया, और तिरुक्कोष्टियूर् नम्बि, पेरिय तिरुमलै नम्बि, तिरुमलै आण्डान् तथा आळ्वार् तिरुवरंगप्पेरुमाळ् अरैयर् ने आळवन्दार् की धरोहर का एक-एक भाग उन्हें सिखाया। उन्होंने काञ्ची में संन्यास लिया और यतिराज — यतियों के राजा — कहलाए।
परम्परा उन्हें सबसे अधिक तिरुक्कोष्टियूर् में याद करती है। तिरुक्कोष्टियूर् नम्बि ने उन्हें अठारह बार आने के बाद ही पवित्र मन्त्र का अर्थ सिखाया और उसे गुप्त रखने को कहा। रामानुज मन्दिर के गोपुर पर चढ़ गए, उद्धार चाहने वाले सबको पुकारा और वह अर्थ सबके सामने खुलकर बता दिया। जब आचार्य ने पूछा कि क्या वे जानते हैं कि इसके लिए उन्हें दण्ड भोगना पड़ सकता है, तो रामानुज ने उत्तर दिया कि यदि इतने लोगों का उद्धार हो, तो वे प्रसन्नता से दण्ड सह लेंगे। तिरुक्कोष्टियूर् नम्बि ने उन्हें गले लगा लिया और एम्पेरुमानार् — "हमारे स्वामी" — कहकर पुकारा।
आळवन्दार् की इच्छा पूरी करते हुए रामानुज ने ब्रह्मसूत्रों पर श्रीभाष्य लिखा, साथ ही गीताभाष्य, वेदार्थ संग्रह, वेदान्त दीप और वेदान्त सार भी। गद्य त्रयम् में उन्होंने श्रीरंगम् में तायार् और पेरुमाळ् के चरणों में की गई अपनी शरणागति को शब्द दिए। उन्होंने श्रीरंगम् मन्दिर की पूजा-व्यवस्था सँवारी। जब एक चोल राजा उनके विरुद्ध हो गया, तो वे कई वर्षों तक तिरुनारायणपुरम् (मेलकोटे) में रहे और बाद में श्रीरंगम् लौट आए।
परम्परा के अनुसार वे 120 वर्ष जीवित रहे। उनका तिरुमेनि आज भी श्रीरंगम् में पूजित है, और पूरी परम्परा उन्हीं का नाम धारण करती है — एम्पेरुमानार् दर्शन, रामानुज सम्प्रदाय।