74 पद्यों की एक तमिल कविता (अन्तिम पद्य उनके शिष्य एरुम्बियप्पा ने जोड़ा), जो आळ्वारों और आचार्यों तथा उनकी रचनाओं का गुणगान करती है। यह पिळ्ळै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषणम् का हृदय भी छोटे, सरल पद्यों में देती है।
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अर्थ
मणवाळ मामुनि अपने आचार्य तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै को प्रणाम करके इस ग्रन्थ का आरम्भ करते हैं। उस गुरु की कृपा से उपदेश की जो परम्परा उन तक पहुँची, उस पर उन्होंने भली-भाँति विचार किया है और अब वे उसे सरल उपदेश के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे इसे वेण्बा छन्द में रचते हैं, ताकि उनके बाद आने वाले लोग भी इसे सीख सकें।
अर्थ
जो पहले से विद्वान हैं, वे इस ग्रन्थ को देखकर प्रसन्न होंगे, और जो सीखने की लालसा रखते हैं, वे इसे पाकर आनन्दित होंगे और इसका अध्ययन करेंगे। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि यदि कुछ लोग ईर्ष्या से इसकी हँसी उड़ाएँ, तो इससे क्या होता है? ऐसे लोग दोष निकालें, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
अर्थ
पूरी परम्परा के लिए एक मंगलकामना: आऴ्वार फलें-फूलें, उनके पवित्र तमिल पाशुर फलें-फूलें, और निर्दोष आचार्य फलें-फूलें। उन आचार्यों ने सब लोकों के कल्याण के लिए जो व्याख्याएँ दीं, वे भी वेदों के साथ-साथ फलें-फूलें।
अर्थ
यह पाशुर आऴ्वारों के नाम उसी क्रम में लेता है जिसमें वे अवतरित हुए: पोय्गै आऴ्वार्, भूतत्ताऴ्वार्, पेयाऴ्वार्, तिरुमऴिशै आऴ्वार्, नम्माऴ्वार्, कुलशेखर आऴ्वार्, पेरियाऴ्वार्, तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार्, तिरुप्पाण् आऴ्वार् और तिरुमंगै आऴ्वार्। हर एक को एक प्रेम भरी उपाधि से पुकारा गया है, जैसे तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् को 'भक्तों के चरणों की धूल'।
अर्थ
आऴ्वार इस संसार का अन्धकार दूर करने के लिए अवतरित हुए, और उन्होंने सुन्दर तमिल में हमें उत्तम ग्रन्थ दिए। सब लोग जान सकें, इसलिए मामुनि कहते हैं कि अब वे वे मास और जन्म-नक्षत्र बताएँगे जिनमें आऴ्वार अवतरित हुए।
अर्थ
ऐप्पसि मास में तीन अनुपम दिन आते हैं: तिरुवोणम्, अविट्टम् और सदयम्। ये पोय्गै आऴ्वार्, भूतत्ताऴ्वार् और पेयाऴ्वार् के जन्म-नक्षत्र हैं, जिनकी कीर्ति सारा संसार गाता है।
अर्थ
ये तीनों आऴ्वार बाकी सभी आऴ्वारों से पहले आए। उन्होंने इस धरती को पहले-पहल तमिल पाशुर दिए और उसका उद्धार किया, इसलिए संसार उन्हें मुदल् आऴ्वार, अर्थात् 'पहले आऴ्वार', कहने लगा और यही नाम टिक गया।
अर्थ
मामुनि अपने भोले मन से पूछते हैं कि क्या वह जानता है कि आज का दिन कितना महान है। यदि मन पूछे कि क्यों, तो वे उत्तर देते हैं कि आज कार्तिगै मास का कार्तिगै नक्षत्र है, वह दिन जब तिरुमंगै आऴ्वार् अवतरित हुए।
अर्थ
जैसे वेदों के साथ छह अंग रहते हैं, वैसे ही नम्माऴ्वार् के तमिल वेद के साथ खड़े रहने वाले छह ग्रन्थ देने के लिए तिरुमंगै आऴ्वार् अवतरित हुए। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि उन भक्तों के चरणों की स्तुति करो जो कार्तिगै-कार्तिगै को अपना उत्सव मानकर आनन्द से मनाते हैं।
अर्थ
कार्तिगै मास का रोहिणी नक्षत्र तिरुप्पाण् आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। जिन भक्तों ने उनका पाशुर अमलनादिपिरान् सीखा है, वे इस दिन को बड़े प्रेम से मनाते हैं।
अर्थ
मार्गऴि मास का केट्टै (ज्येष्ठा) नक्षत्र वेदों के महान ज्ञाता तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। वेदों के जानकार इसे मनाते हैं।
अर्थ
तै मास का मघा नक्षत्र वह दिन है जब शुद्ध ज्ञान वाले सन्त तिरुमऴिशै आऴ्वार् अवतरित हुए। पवित्र जन इस दिन का आदर करते हैं।
अर्थ
मासि मास का पुनर्वसु नक्षत्र कोल्लि नगर के राजा कुलशेखर आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। सज्जन इसे मनाते हैं।
अर्थ
मामुनि वैकासि मास के विशाखा नक्षत्र की महिमा का उद्घोष करते हैं। इसी दिन सुन्दर तिरुक्कुरुगूर् (आऴ्वार् तिरुनगरि) में नम्माऴ्वार् अवतरित हुए, वे सत्यस्वरूप जिन्होंने हमें तमिल में वेद दिया।
अर्थ
क्या वैकासि विशाखा के समान कोई दिन है? क्या नम्माऴ्वार् (शठकोप) के समान कोई है, तिरुवाय्मोऴि के समान कोई ग्रन्थ, या संसार में तिरुक्कुरुगूर् के समान कोई नगर? यह पाशुर प्रश्न करके ही उत्तर देता है: ऐसा कोई नहीं मिलता।
अर्थ
मामुनि अपने मन से पूछते हैं कि क्या वह जानता है कि आज का दिन क्यों महान है। आज आनि मास का स्वाति नक्षत्र है, उन पेरियाऴ्वार् का अवतार-दिवस जिन्होंने भगवान के लिए मंगलकामना का गीत तिरुप्पल्लाण्डु गाया।
अर्थ
जो लोग पेरियाऴ्वार् के अवतार-दिवस आनि स्वाति को संजोकर रखते हैं, उनके समान इस संसार में कोई नहीं। इसलिए मामुनि अपने मन से कहते हैं कि इस दिन को सदा स्मरण में रखो।
अर्थ
दूसरे आऴ्वारों ने अपने-अपने प्रेम के अनुसार भगवान की मंगलकामना की। श्रीविल्लिपुत्तूर् के पेरियाऴ्वार् ने यह भगवान की रक्षा की उमड़ती हुई चिन्ता से किया, और इसी कारण केवल वे ही पेरियाऴ्वार्, अर्थात् 'महान आऴ्वार', कहलाए।
अर्थ
जैसे वेदों के आरम्भ में ओंकार है, वैसे ही आऴ्वारों के सभी ग्रन्थों के आरम्भ में तिरुप्पल्लाण्डु है। इसमें उन सबका सार संक्षेप में है और यह मंगलकामना का गीत है, इसलिए इसका सबसे पहले आना उचित ही है।
अर्थ
क्या तिरुप्पल्लाण्डु के समान कोई ग्रन्थ है? क्या पेरियाऴ्वार् के समान कोई है? मामुनि अपने व्याकुल मन से कहते हैं कि सब आऴ्वारों और उनके सब ग्रन्थों पर दृष्टि डालकर स्वयं देख ले।
अर्थ
आगे मामुनि आण्डाळ्, मधुरकवि आऴ्वार् और श्री रामानुज (यतिराज) की ओर मुड़ते हैं। वे संसार को बताएँगे कि ये किन मासों और नक्षत्रों में अवतरित हुए और वे दिन विशेष क्यों हैं।
अर्थ
आज तिरुवाडिप्पूरम् है, आडि मास का पूरम् नक्षत्र। इस दिन आण्डाळ् वैकुण्ठ के अनन्त आनन्द को छोड़कर हमारे लिए पेरियाऴ्वार् की पुत्री बनकर यहाँ उतर आईं।
अर्थ
क्या तिरुवाडिप्पूरम् जितना महान कोई दिन है, जब आण्डाळ् पेरियाऴ्वार् की पुत्री के रूप में अवतरित हुईं? आण्डाळ् के समान कोई मिल जाए, तभी इस दिन के समान कोई दूसरा दिन हो सकता है।
अर्थ
आण्डाळ् आऴ्वारों के कुल की एकमात्र सन्तान हैं, और उनकी भक्ति उन सबकी भक्ति से भी आगे है। छोटी आयु में ही वे भक्ति में परिपक्व हो गईं। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि हर दिन प्रेम और आनन्द से उनकी स्तुति करो।
अर्थ
चित्तिरै मास का चित्तिरै (चित्रा) नक्षत्र मधुरकवि आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। आऴ्वारों के सभी अवतार-दिवसों में यह हमारे लिए सबसे उपयुक्त है, क्योंकि मधुरकवि आऴ्वार् की भक्ति पूरी तरह अपने आचार्य नम्माऴ्वार् को समर्पित थी।
अर्थ
मधुरकवि आऴ्वार् के छोटे से पाशुर-ग्रन्थ कण्णिनुण् शिऱुत्ताम्बु को आचार्यों ने आऴ्वारों के पाशुर-संग्रह के बीच में रखा। उन्होंने इसका प्रयोजन जानकर ऐसा किया, ठीक वैसे ही जैसे तिरुमन्त्र के बीच में मध्य पद रहता है।
अर्थ
चित्तिरै मास का तिरुवादिरै (आर्द्रा) नक्षत्र किसी भी दूसरे दिन से महान है, और मामुनि बताते हैं क्यों। यह श्री रामानुज (यतिराज) का अवतार-दिवस है, इसलिए सारा संसार इसे मनाता है।
अर्थ
आऴ्वारों के सभी अवतार-दिवसों में जो दिन सचमुच हमें जीवन देता है, वह चित्तिरै का तिरुवादिरै है। उसी दिन श्री रामानुज सब लोकों के उद्धार के लिए संसार में आए।
अर्थ
क्योंकि इसी दिन हमारे पिता श्री रामानुज हमारे लिए संसार में आए, मामुनि अपने मन से कहते हैं कि तिरुवादिरै की महिमा कभी मत भूलना। वे चाहते हैं कि इसे वर्ष में केवल एक बार नहीं, सदा मन में रखा जाए।
अर्थ
यहाँ से आऴ्वारों के जन्मस्थान आरम्भ होते हैं। पहले तीन आऴ्वार काञ्ची (पोय्गै आऴ्वार्), आज के मामल्लपुरम् यानी मल्लै (भूतत्ताऴ्वार्) और मयिलापुर् (पेयाऴ्वार्) में अवतरित हुए। तिरुमंगै आऴ्वार् मण्णि नदी के तट पर तिरुक्कुरैयलूर् में और तिरुप्पाण् आऴ्वार् उऱैयूर् में अवतरित हुए।
अर्थ
तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् तिरुमण्डङ्गुडि में और कुलशेखर आऴ्वार् तिरुवञ्जिक्कळम् में अवतरित हुए। सब जगह लोग इन दोनों स्थानों का आदर करते हैं।
अर्थ
तिरुमऴिशै आऴ्वार् तिरुमऴिशै में, नम्माऴ्वार् तिरुक्कुरुगूर् में और पेरियाऴ्वार् श्रीविल्लिपुत्तूर् में अवतरित हुए। ये वे नगर हैं जहाँ वे प्रकट हुए।
अर्थ
आण्डाळ् श्रीविल्लिपुत्तूर् में, मधुरकवि आऴ्वार् तिरुक्कोळूर् में और श्री रामानुज श्रीपेरुम्बुदूर् में अवतरित हुए। इस पाशुर के साथ जन्मस्थानों की सूची पूरी होती है।
अर्थ
अब मामुनि संसार को चार बातें बताने का वचन देते हैं: आऴ्वारों की महिमा, उनके पाशुरों की महिमा, उन पाशुरों का पोषण करने वाले आचार्य, और सबके कल्याण के लिए आचार्यों द्वारा लिखी गई व्याख्याएँ। आगे के पाशुर इसी वचन को पूरा करते हैं।
अर्थ
जो लोग आऴ्वारों और उनके पाशुरों को तुच्छ समझते हैं, वे अपना ही विनाश करते हैं। इसलिए मामुनि अपने मन से कहते हैं कि ऐसे लोगों से सदा दूर रहो।
अर्थ
आऴ्वारों और उनके पाशुरों की महिमा को सचमुच कौन जानता है? केवल नाथमुनि से आरम्भ होने वाले हमारे आचार्य, जिन्हें वह कृपा मिली। मामुनि अपने मन से पूछते हैं, क्या कोई और जान सकता है?
अर्थ
पूर्वाचार्य गहनतम उपदेश एक समय में केवल एक शिष्य को देते थे। श्री रामानुज ने करुणा से अपने अनुयायियों से कहा कि सीखने की लालसा रखने वाले हर व्यक्ति को सिखाओ, और इस प्रकार उन्होंने वह सीमा हटा दी।
अर्थ
श्रीरंगम के स्वामी नम्पेरुमाळ् ने इस परम्परा को श्री रामानुज के नाम पर 'एम्पेरुमानार् दर्शन' नाम दिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि संसार जाने कि श्री रामानुज ने ही इसका पोषण और प्रसार किया।
अर्थ
मामुनि उन आचार्यों के नाम लेते हैं जिन्होंने अपनी व्याख्याओं से तिरुवाय्मोऴि की रक्षा की: पिळ्ळान्, नंजीयर्, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै और अऴगिय मणवाळ जीयर्। वे अपने मन से कहते हैं कि इन्हें स्मरण करो।
अर्थ
यदि पिळ्ळान् और उनके बाद के आचार्यों ने अपनी व्याख्याएँ न लिखी होतीं, तो हमारे समय में तिरुवाय्मोऴि का अर्थ कौन समझा सकता था? मामुनि अपने मन से इसका उत्तर माँगते हैं।
अर्थ
श्री रामानुज की कृपा से पिळ्ळान् ने नम्माऴ्वार् की तिरुवाय्मोऴि पर पहली व्याख्या, 'छह हजार' (आऱायिरप्पडि), लिखी। यह आनन्द से भरी व्याख्या है, जो नम्माऴ्वार् के वचनों के प्रति गहरे प्रेम से लिखी गई।
अर्थ
ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित नंजीयर् ने अपने गुरु पराशर भट्टर् की कृपा से तिरुवाय्मोऴि पर 'नौ हजार' (ओन्बदिनायिरप्पडि) व्याख्या लिखी। उन्होंने इसे नम्माऴ्वार् का आशय प्रकट करने की बड़ी उत्सुकता से लिखा।
अर्थ
नम्पिळ्ळै की आज्ञा और कृपा से पेरियवाच्चान् पिळ्ळै ने तिरुवाय्मोऴि पर 'चौबीस हजार' (इरुपत्तुनालायिरप्पडि) व्याख्या लिखी। भक्त इसकी भक्ति की मधुरता के कारण इसका रस लेते हैं।
अर्थ
वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने तिरुवाय्मोऴि पर नम्पिळ्ळै के प्रवचनों को लिख लिया, ताकि सारा देश उन्हें जान सके। यही ईडु है, 'छत्तीस हजार'।
अर्थ
ताकि बाद के समय के लोग इसे सीख सकें, अऴगिय मणवाळ जीयर् ने अपनी गहरी विद्वत्ता से तिरुवाय्मोऴि पर 'बारह हजार' (पन्नीरायिरप्पडि) व्याख्या लिखी। इसे निर्दोष व्याख्या कहकर सराहा जाता है।
अर्थ
पेरियवाच्चान् पिळ्ळै ने आऴ्वारों के बाकी पाशुरों पर भी व्याख्याएँ लिखीं। उन्हीं के कारण बाद के आचार्य उन पाशुरों का अर्थ समझ सके, जिन्हें अन्यथा समझना बहुत कठिन होता।
अर्थ
नंजीयर् ने सभी पाशुरों पर नहीं, केवल कुछ पर व्याख्याएँ लिखीं। पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई और अऴगिय मणवाळ जीयर् ने भी कुछ ग्रन्थों पर व्याख्याएँ लिखीं।
अर्थ
जब वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने ईडु लिख लिया, तो नम्पिळ्ळै ने उसे माँगकर ले लिया। फिर उन्होंने उसे सुरक्षित रखने और आगे सौंपने के लिए ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् को दे दिया।
अर्थ
यह पाशुर बताता है कि ईडु कैसे आगे सौंपा गया: ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् से उनके पुत्र को, फिर नालूर् पिळ्ळै को, फिर नालूर् पिळ्ळै के पुत्र को, जिन्होंने इसे बाद के आचार्यों को पढ़ाया। इसी परम्परा से यह मामुनि के अपने गुरु तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै तक पहुँचा।
अर्थ
नम्पेरुमाळ्, नम्माऴ्वार्, नंजीयर् और नम्पिळ्ळै, ये सभी नाम 'नम्' ('हमारे') से आरम्भ होते हैं, और हर एक की महिमा के कारण प्रेम से दिए गए। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि आज इन्हीं नामों से उनकी स्तुति करो।
अर्थ
नम्पिळ्ळै से प्रसन्न होकर कन्दाडै तोऴप्पर् ने कहा, 'क्या ये सारे संसार के आचार्य हैं?' तब से लोकाचार्य नाम नम्पिळ्ळै के साथ जुड़ गया।
अर्थ
अपने गुरु नम्पिळ्ळै के प्रति प्रेम के कारण वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने अपने पुत्र को भी वही नाम दिया। इसी प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य नाम आया और सब ओर फैल गया।
अर्थ
पिळ्ळै लोकाचार्य के सभी ग्रन्थों में श्रीवचन भूषण के समान कोई नहीं। मामुनि कहते हैं कि यह चाटुकारिता नहीं, सीधा सत्य है।
अर्थ
पिळ्ळै लोकाचार्य ने पूर्वाचार्यों के वचनों को एकत्र करके उन्हें विद्वानों के लिए एक चमकते आभूषण की तरह सजाया। इसलिए उन्होंने इस ग्रन्थ का नाम श्रीवचन भूषण रखा, अर्थात् 'वचनों का आभूषण'।
अर्थ
श्रीवचन भूषण के पूरे गहरे अर्थ को कौन जानता है, और कौन उसके अनुसार जीता है? मामुनि कहते हैं कि यदि ऐसा एक भी व्यक्ति हो, तो वह दुर्लभ है, क्योंकि यह हर किसी की पहुँच की बात नहीं।
अर्थ
जो भी उद्धार चाहते हैं, उन सबको मामुनि यह सलाह देते हैं: पिळ्ळै लोकाचार्य के दिए ग्रन्थ श्रीवचन भूषण को अपने आचार्य से सीखो, और जैसा यह सिखाता है वैसा जीवन जियो। भगवान तक पहुँचना चाहने वाले हर व्यक्ति की चिन्ता से वे यह कहते हैं।
अर्थ
जो लोग अपने आचार्य से श्रीवचन भूषण सुन सकते हैं, उस पर मनन कर सकते हैं और उसके अनुसार जी सकते हैं, वे इसे क्यों न सीखें? जो इसकी उपेक्षा करते हैं, उन पर मामुनि आश्चर्य करते हैं।
अर्थ
मामुनि बताते हैं कि श्रीवचन भूषण को कैसे अपनाएँ: यदि सच्ची परम्परा वालों द्वारा सराही गई व्याख्याएँ हों, तो खुले और सन्तुलित मन से उन्हीं के द्वारा इसे सीखो। यह अपने आचार्य से पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ है।
अर्थ
श्रीवचन भूषण पर विचार करें या उसे ऊँचे स्वर में कहें, मामुनि को यह हर दिन मधुर लगता है। वे दुख के साथ दूसरों से पूछते हैं कि इसके समान कौन-सा आनन्द तुम्हें मिल सकता है?
अर्थ
जिन्हें अपने आचार्य के चरणों से प्रेम नहीं, वे भगवान से प्रेम दिखाएँ तब भी भगवान के नित्य धाम तक नहीं पहुँचेंगे। लक्ष्मीपति भगवान उन्हें वह धाम नहीं देंगे।
अर्थ
मामुनि संसार से कहते हैं कि यदि कोई ऐसे आचार्य के पास जाए जिनमें सच्चा ज्ञान और सदाचार दोनों हों, तो लक्ष्मीपति भगवान स्वयं उसे वैकुण्ठ देंगे। ऐसे आचार्य तक पहुँचना ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग है।
अर्थ
यदि तुम उद्धार चाहते हो, तो अपना प्रेम अपने आचार्य के चरणों में लगाओ। मामुनि सच कहते हैं कि तब भगवान का परम धाम हथेली पर रखे आँवले जितना निश्चित हो जाता है।
अर्थ
तुम्हारे आचार्य ने तुम पर जो महान उपकार किया है, यदि वह तुम्हारे हृदय में स्पष्ट चमकता रहे, तो तुम उनसे दूर रहना सह नहीं पाओगे। मामुनि कहते हैं कि वे नहीं समझ पाते कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है।
अर्थ
आचार्य की सेवा तभी तक हो सकती है जब तक वे इस संसार में हैं। यह जानते हुए, मामुनि अपने मन से पूछते हैं, सेवा की लालसा के बिना कौन उनसे दूर रहेगा?
अर्थ
आचार्य शिष्य की आत्मा की चिन्ता करते हैं, और शिष्य प्रेम भरी सेवा से आचार्य की शारीरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखता है। बहुतों ने यह सुन्दर उपदेश सुना है, फिर भी मामुनि कहते हैं कि इसके अनुसार जीना किसी के लिए भी कठिन है।
अर्थ
पिन्बऴगिय पेरुमाळ् जीयर् ने वैकुण्ठ की लालसा तक को एक ओर रखकर गहरे प्रेम से नम्पिळ्ळै की सेवा की। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि उस उदाहरण पर सदा विचार करो।
अर्थ
जो लोग नहीं जानते कि आचार्यों ने कैसे जीवन जिया, उनकी बातों से भ्रमित मत हो। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि पूर्वाचार्यों के श्रेष्ठ मार्ग को ही पकड़े रहो।
अर्थ
लोग तीन प्रकार के होते हैं: जो शास्त्रों को अस्वीकार करते हैं, जो उन्हें स्वीकार करके उनके अनुसार जीते हैं, और जो नाम के लिए उन्हें स्वीकार करते हैं पर उनका पालन नहीं करते। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि पहले और अन्तिम को छोड़ दो और बीच वाले सच्चे आस्तिकों का हर दिन अनुसरण करो।
अर्थ
सुगन्धित वस्तु के पास रखी चीज स्वयं सुगन्धित हो जाती है। उसी प्रकार जो सज्जनों के संग में रहते हैं, उनमें उनके सद्गुण आ जाते हैं।
अर्थ
दुर्गन्ध वाली वस्तु के पास रखी चीज उसकी गन्ध ले लेती है। उसी प्रकार जो बुरे स्वभाव वाले लोगों का संग करते हैं, उनमें उनकी बुरी आदतें आ जाती हैं।
अर्थ
कुछ लोग बड़ों के दिए उपदेश को ध्यान से नहीं सीखते। जो उनके मन में आता है वही कहते हैं और उसे परम्परा से प्राप्त शुद्ध उपदेश बताते हैं। मामुनि उन्हें मूर्ख कहते हैं।
अर्थ
जो पूर्वाचार्यों के ज्ञान और आचरण को निष्ठा से आगे सौंपते हैं, उनके वचनों से सीखो और मन को स्पष्ट करो। फिर, मामुनि कहते हैं, किसी ज्ञानी आचार्य को दृढ़ता से पकड़कर इस अन्धकार भरे संसार में भी आनन्द से जियो।
अर्थ
मामुनि कहते हैं कि जो इस उपदेश रत्नमाला का हर दिन चिन्तन करते हैं, वे सदा के लिए श्री रामानुज की कृपा के पात्र बनते हैं और अच्छा जीवन जीते हैं। इसी आशीर्वाद के साथ वे अपने पाशुर समाप्त करते हैं।
अर्थ
परम्परा से कहा जाता है कि यह समापन पाशुर मणवाळ मामुनि के शिष्य एऱुम्बियप्पा का है। वे सभी जीवों से कहते हैं कि यदि वे प्रेम भरे चिन्तन में मामुनि के चरण-कमलों को अपने सिर पर धारण करें, तो वैकुण्ठ की देहली पर जीवों को ग्रहण करने वाले अमानव अपना कर्तव्य मानकर उनका हाथ पकड़ लेंगे।
पाठ को koyil.org, acharya.org, Tamil Wikisource से श्लोक-दर-श्लोक मिलाया गया है। अर्थ पाठक की सहायता के लिए सरल रूप में दिए गए हैं; पाठ किसी अध्यापक से सीखें।
ये पाठक की सहायता के लिए छोटे परिचय हैं; स्वयं इन ग्रन्थों का अध्ययन अपने आचार्य के अधीन करना सबसे अच्छा है।
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