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श्रीमते रामानुजाय नमः
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उपदेश रत्नमाला

मणवाळ मामुनि की रचना · तमिल · 74 पाशुर

74 पद्यों की एक तमिल कविता (अन्तिम पद्य उनके शिष्य एरुम्बियप्पा ने जोड़ा), जो आळ्वारों और आचार्यों तथा उनकी रचनाओं का गुणगान करती है। यह पिळ्ळै लोकाचार्य के श्रीवचन भूषणम् का हृदय भी छोटे, सरल पद्यों में देती है।

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पाशुर 1

ऎंदै तिरुवाय्मॊऴिप् पिळ्ळै इऩ्ऩरुळाल्वंद उबदेश मार्क्कत्तैच् चिंदै सॆय्दुपिऩ्ऩवरुम् कऱ्क उबदेशमाय्प् पेशुगिऩ्ऱेऩ्मऩ्ऩिय सीर् वॆण्बाविल् वैत्तु

अर्थ

मणवाळ मामुनि अपने आचार्य तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै को प्रणाम करके इस ग्रन्थ का आरम्भ करते हैं। उस गुरु की कृपा से उपदेश की जो परम्परा उन तक पहुँची, उस पर उन्होंने भली-भाँति विचार किया है और अब वे उसे सरल उपदेश के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे इसे वेण्बा छन्द में रचते हैं, ताकि उनके बाद आने वाले लोग भी इसे सीख सकें।

पाशुर 2

कऱ्ऱोर्गळ् ताम् उगप्पर् कल्वि तऩ्ऩिल् आशै उळ्ळोर्पॆऱ्ऱोम् ऎऩ उगंदु पिऩ्बु कऱ्पर् मऱ्ऱोर्गळ्माच्चरियत्ताल् इगऴिल् वंददॆऩ् नॆंजे इगऴ्गैआच्चरियमो ताऩ् अवर्क्कु

अर्थ

जो पहले से विद्वान हैं, वे इस ग्रन्थ को देखकर प्रसन्न होंगे, और जो सीखने की लालसा रखते हैं, वे इसे पाकर आनन्दित होंगे और इसका अध्ययन करेंगे। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि यदि कुछ लोग ईर्ष्या से इसकी हँसी उड़ाएँ, तो इससे क्या होता है? ऐसे लोग दोष निकालें, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

पाशुर 3

आऴ्वार्गळ् वाऴि अरुळिच्चॆयल् वाऴिताऴ्वादुमिल् कुरवर् ताम् वाऴि एऴ् पारुम्उय्य अवर्गळ् उरैत्तवैगळ् ताम् वाऴिसॆय्य मऱै तऩ्ऩुडऩे सेर्ंदु

अर्थ

पूरी परम्परा के लिए एक मंगलकामना: आऴ्वार फलें-फूलें, उनके पवित्र तमिल पाशुर फलें-फूलें, और निर्दोष आचार्य फलें-फूलें। उन आचार्यों ने सब लोकों के कल्याण के लिए जो व्याख्याएँ दीं, वे भी वेदों के साथ-साथ फलें-फूलें।

पाशुर 4

पॊय्गैयार् पूदत्तार् पेयार् पुगऴ् मऴिशैऐयऩ् अरुळ् माऱऩ् सेरलर् कोऩ् तुय्य पट्टनादऩ् अऩ्बर् ताळ् तूळि नऱ्पाणऩ् नऱ्कलियऩ्ईदिवर् तोऱ्ऱत्तु अडैवाम् इंगु

अर्थ

यह पाशुर आऴ्वारों के नाम उसी क्रम में लेता है जिसमें वे अवतरित हुए: पोय्गै आऴ्वार्, भूतत्ताऴ्वार्, पेयाऴ्वार्, तिरुमऴिशै आऴ्वार्, नम्माऴ्वार्, कुलशेखर आऴ्वार्, पेरियाऴ्वार्, तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार्, तिरुप्पाण् आऴ्वार् और तिरुमंगै आऴ्वार्। हर एक को एक प्रेम भरी उपाधि से पुकारा गया है, जैसे तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् को 'भक्तों के चरणों की धूल'।

पाशुर 5

अंदमिऴाल् नऱ्कलैगळ् आय्ंदुरैत्त आऴ्वार्गळ्इंद उलगिल् इरुळ् नींग वंदुदित्तमादंगळ् नाळ्गळ् तम्मै मण्णुलगोर् ताम् अऱियईदॆऩ्ऱु सॊल्लुवोम् याम्

अर्थ

आऴ्वार इस संसार का अन्धकार दूर करने के लिए अवतरित हुए, और उन्होंने सुन्दर तमिल में हमें उत्तम ग्रन्थ दिए। सब लोग जान सकें, इसलिए मामुनि कहते हैं कि अब वे वे मास और जन्म-नक्षत्र बताएँगे जिनमें आऴ्वार अवतरित हुए।

पाशुर 6

ऐप्पशियिल् ओणम् अविट्टम् सदयम् इवैऒप्पिलवा नाळ्गळ् उलगत्तीर् ऎप्पुवियुम्पेशु पुगऴ्प् पॊय्गैयार् पूदत्तार् पेयाऴ्वार्तेशुडऩे तोऩ्ऱु सिऱप्पाल्

अर्थ

ऐप्पसि मास में तीन अनुपम दिन आते हैं: तिरुवोणम्, अविट्टम् और सदयम्। ये पोय्गै आऴ्वार्, भूतत्ताऴ्वार् और पेयाऴ्वार् के जन्म-नक्षत्र हैं, जिनकी कीर्ति सारा संसार गाता है।

पाशुर 7

मऱ्ऱुळ्ळ आऴ्वार्गळुक्कु मुऩ्ऩे वंदुदित्तुनऱ्ऱमिऴाल् नूल् सॆय्दु नाट्टै उय्त्त पॆऱ्ऱिमैयोर्ऎऩ्ऱु मुदल् आऴ्वार्गळ् ऎऩ्ऩुम् पॆयर् इवर्क्कुनिऩ्ऱदुलगत्ते निगऴ्ंदु

अर्थ

ये तीनों आऴ्वार बाकी सभी आऴ्वारों से पहले आए। उन्होंने इस धरती को पहले-पहल तमिल पाशुर दिए और उसका उद्धार किया, इसलिए संसार उन्हें मुदल् आऴ्वार, अर्थात् 'पहले आऴ्वार', कहने लगा और यही नाम टिक गया।

पाशुर 8

पेदै नॆंजे इऩ्ऱैप् पॆरुमै अऱिंदिलैयोएदु पॆरुमै इऩ्ऱैक्कु ऎऩ्ऱॆऩ्ऩिल् ओदुगिऩ्ऱेऩ्वाय्त्त पुगऴ् मंगैयर्गोऩ् मानिलत्तिल् वंदुदित्तकार्त्तिगैयिल् कार्त्तिगै नाळ् काण्

अर्थ

मामुनि अपने भोले मन से पूछते हैं कि क्या वह जानता है कि आज का दिन कितना महान है। यदि मन पूछे कि क्यों, तो वे उत्तर देते हैं कि आज कार्तिगै मास का कार्तिगै नक्षत्र है, वह दिन जब तिरुमंगै आऴ्वार् अवतरित हुए।

पाशुर 9

माऱऩ् पणित्त तमिऴ् मऱैक्कु मंगैयर् कोऩ्आऱंगम् कूऱ अवदरित्त वीऱुडैयकार्त्तिगैयिल् कार्त्तिगै नाळ् इऩ्ऱॆऩ्ऱु कादलिप्पार्वाय्त्त मलर्त् ताळ्गळ् नॆंजे वाऴ्त्तु

अर्थ

जैसे वेदों के साथ छह अंग रहते हैं, वैसे ही नम्माऴ्वार् के तमिल वेद के साथ खड़े रहने वाले छह ग्रन्थ देने के लिए तिरुमंगै आऴ्वार् अवतरित हुए। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि उन भक्तों के चरणों की स्तुति करो जो कार्तिगै-कार्तिगै को अपना उत्सव मानकर आनन्द से मनाते हैं।

पाशुर 10

कार्त्तिगैयिल् उरोगिणि नाळ् काण्मिऩ् इऩ्ऱु काशिऩियीर्वाय्त्त पुगऴ्प् पाणर् वंदुदिप्पाल् आत्तियर्गळ्अऩ्बुडऩे ताऩ् अमलऩादिबिराऩ् कऱ्ऱदऱ्पिऩ्नऩ्गुडऩे कॊंडाडुम् नाळ्

अर्थ

कार्तिगै मास का रोहिणी नक्षत्र तिरुप्पाण् आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। जिन भक्तों ने उनका पाशुर अमलनादिपिरान् सीखा है, वे इस दिन को बड़े प्रेम से मनाते हैं।

पाशुर 11

मऩ्ऩिय सीर् मार्गऴियिल् केट्टै इऩ्ऱु मानिलत्तीर्ऎऩ्ऩिदऩुक्कु एऱ्ऱम् ऎऩिल् उरैक्केऩ् तुऩ्ऩु पुगऴ्मामऱैयोऩ् तॊंडरडिप्पॊडि आऴ्वार् पिऱप्पाल्नाऩ्मऱैयोर् कॊंडाडुम् नाळ्

अर्थ

मार्गऴि मास का केट्टै (ज्येष्ठा) नक्षत्र वेदों के महान ज्ञाता तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। वेदों के जानकार इसे मनाते हैं।

पाशुर 12

तैयिल् मगम् इऩ्ऱु तारणियीर् एऱ्ऱम् इंदत्तैयिल् मगत्तुक्कुच् चाऱ्ऱुगिऩ्ऱेऩ् तुय्य मदिपॆऱ्ऱ मऴिशैप् पिराऩ् पिऱंद नाळ् ऎऩ्ऱुनऱ्ऱवर्गळ् कॊंडाडुम् नाळ्

अर्थ

तै मास का मघा नक्षत्र वह दिन है जब शुद्ध ज्ञान वाले सन्त तिरुमऴिशै आऴ्वार् अवतरित हुए। पवित्र जन इस दिन का आदर करते हैं।

पाशुर 13

माशिप् पुऩर्बूशम् काण्मिऩ् इऩ्ऱु मण्णुलगीर्तेशु इत्तिवशत्तुक्कु एदॆऩ्ऩिल् पेशुगिऩ्ऱेऩ्कॊल्लि नगर्क् कोऩ् कुलशेगरऩ् पिऱप्पाल्नल्लवर्गळ् कॊंडाडुम् नाळ्

अर्थ

मासि मास का पुनर्वसु नक्षत्र कोल्लि नगर के राजा कुलशेखर आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। सज्जन इसे मनाते हैं।

पाशुर 14

एरार् वैगाशि विशागत्तिऩ् एऱ्ऱत्तैप्पारोर् अऱियप् पगर्गिऩ्ऱेऩ् सीरारुम्वेदम् तमिऴ् सॆय्द मॆय्यऩ् ऎऴिल् कुरुगैनादऩ् अवदरित्त नाळ्

अर्थ

मामुनि वैकासि मास के विशाखा नक्षत्र की महिमा का उद्घोष करते हैं। इसी दिन सुन्दर तिरुक्कुरुगूर् (आऴ्वार् तिरुनगरि) में नम्माऴ्वार् अवतरित हुए, वे सत्यस्वरूप जिन्होंने हमें तमिल में वेद दिया।

पाशुर 15

उंडो वैगाशि विशागत्तुक्कु ऒप्पॊरु नाळ्उंडो सडगोबर्क्कु ऒप्पॊरुवर् उंडोतिरुवाय्मॊऴिक्कु ऒप्पु तॆऩ् कुरुगैक्कु उंडोऒरु पार् तऩिल् ऒक्कुम् ऊर्

अर्थ

क्या वैकासि विशाखा के समान कोई दिन है? क्या नम्माऴ्वार् (शठकोप) के समान कोई है, तिरुवाय्मोऴि के समान कोई ग्रन्थ, या संसार में तिरुक्कुरुगूर् के समान कोई नगर? यह पाशुर प्रश्न करके ही उत्तर देता है: ऐसा कोई नहीं मिलता।

पाशुर 16

इऩ्ऱैप् पॆरुमै अऱिंदिलैयो एऴै नॆंजेइऩ्ऱैक्कु ऎऩ् एऱ्ऱम् ऎऩिल् उरैक्केऩ् नऩ्ऱि पुऩैपल्लांडु पाडिय नम् पट्टर् पिराऩ् वंदुदित्तनल्लाऩियिल् सोदि नाळ्

अर्थ

मामुनि अपने मन से पूछते हैं कि क्या वह जानता है कि आज का दिन क्यों महान है। आज आनि मास का स्वाति नक्षत्र है, उन पेरियाऴ्वार् का अवतार-दिवस जिन्होंने भगवान के लिए मंगलकामना का गीत तिरुप्पल्लाण्डु गाया।

पाशुर 17

मानिलत्तिल् मुऩ् नम् पॆरियाऴ्वार् वंदुदित्तआऩि तऩ्ऩिल् सोदि ऎऩ्ऱाल् आदरिक्कुम् ञाऩियर्क्कुऒप्पोर् इलै इव्वुलगु तऩिल् ऎऩ्ऱु नॆंजेऎप्पोदुम् सिंदित्तिरु

अर्थ

जो लोग पेरियाऴ्वार् के अवतार-दिवस आनि स्वाति को संजोकर रखते हैं, उनके समान इस संसार में कोई नहीं। इसलिए मामुनि अपने मन से कहते हैं कि इस दिन को सदा स्मरण में रखो।

पाशुर 18

मंगळाशाशऩत्तिल् मऱ्ऱुळ्ळ आऴ्वार्गळ्तंगळ् आर्वत्तळवु ताऩ् अऩ्ऱि पॊंगुम्परिवाले विल्लिबुत्तूर्प् पट्टर् पिराऩ् पॆऱ्ऱाऩ्पॆरियाऴ्वार् ऎऩ्ऩुम् पॆयर्

अर्थ

दूसरे आऴ्वारों ने अपने-अपने प्रेम के अनुसार भगवान की मंगलकामना की। श्रीविल्लिपुत्तूर् के पेरियाऴ्वार् ने यह भगवान की रक्षा की उमड़ती हुई चिन्ता से किया, और इसी कारण केवल वे ही पेरियाऴ्वार्, अर्थात् 'महान आऴ्वार', कहलाए।

पाशुर 19

कोदिलवाम् आऴ्वार्गळ् कूऱु कलैक्कॆल्लाम्आदि तिरुप्पल्लांडु आऩदुवुम् वेदत्तुक्कुओम् ऎऩ्ऩुम् अदु पोल् उळ्ळदुक्कॆल्लाम् सुरुक्काय्त्ताऩ् मंगलम् आदलाल्

अर्थ

जैसे वेदों के आरम्भ में ओंकार है, वैसे ही आऴ्वारों के सभी ग्रन्थों के आरम्भ में तिरुप्पल्लाण्डु है। इसमें उन सबका सार संक्षेप में है और यह मंगलकामना का गीत है, इसलिए इसका सबसे पहले आना उचित ही है।

पाशुर 20

उंडो तिरुप्पल्लांडुक्कु ऒप्पदोर् कलै ताऩ्उंडो पॆरियाऴ्वार्क्कु ऒप्पॊरुवर् तण् तमिऴ् नूल्सॆय्दरुळुम् आऴ्वार्गळ् तम्मिल् अवर् सॆय् कलैयिल्पैदल् नॆंजे नी उणर्ंदु पार्

अर्थ

क्या तिरुप्पल्लाण्डु के समान कोई ग्रन्थ है? क्या पेरियाऴ्वार् के समान कोई है? मामुनि अपने व्याकुल मन से कहते हैं कि सब आऴ्वारों और उनके सब ग्रन्थों पर दृष्टि डालकर स्वयं देख ले।

पाशुर 21

आऴ्वार् तिरुमगळार् आंडाळ् मदुरगविआऴ्वार् ऎदिराशराम् इवर्गळ् वाऴ्वागवंदुदित्त मादंगळ् नाळ्गळ् तम्मिऩ् वाशियैयुम्इंद उलगोर्क्कु उरैप्पोम् याम्

अर्थ

आगे मामुनि आण्डाळ्, मधुरकवि आऴ्वार् और श्री रामानुज (यतिराज) की ओर मुड़ते हैं। वे संसार को बताएँगे कि ये किन मासों और नक्षत्रों में अवतरित हुए और वे दिन विशेष क्यों हैं।

पाशुर 22

इऩ्ऱो तिरुवाडिप्पूरम् ऎमक्कागअऩ्ऱो इंगु आंडाळ् अवदरित्ताळ् कुऩ्ऱादवाऴ्वाऩ वैगुंद वाऩ् पोगम् तऩ्ऩै इगऴ्ंदुआऴ्वार् तिरुमगळाराय्

अर्थ

आज तिरुवाडिप्पूरम् है, आडि मास का पूरम् नक्षत्र। इस दिन आण्डाळ् वैकुण्ठ के अनन्त आनन्द को छोड़कर हमारे लिए पेरियाऴ्वार् की पुत्री बनकर यहाँ उतर आईं।

पाशुर 23

पॆरियाऴ्वार् पॆण् पिळ्ळैयाय् आंडाळ् पिऱंदतिरुवाडिप् पूरत्तिऩ् सीर्मै ऒरु नाळैक्कुउंडो मऩमे उणर्ंदु पार् आंडाळुक्कुउंडागिल् ऒप्पिदऱ्कुम् उंडु

अर्थ

क्या तिरुवाडिप्पूरम् जितना महान कोई दिन है, जब आण्डाळ् पेरियाऴ्वार् की पुत्री के रूप में अवतरित हुईं? आण्डाळ् के समान कोई मिल जाए, तभी इस दिन के समान कोई दूसरा दिन हो सकता है।

पाशुर 24

अंजु कुडिक्कु ऒरु संददियाय् आऴ्वार्गळ्तम् सॆयलै विंजि निऱ्कुम् तऩ्मैयळाय् पिंजाय्प्पऴुत्ताळै आंडाळैप् पत्तियुडऩ् नाळुम्वऴुत्ताय् मऩमे मगिऴ्ंदु

अर्थ

आण्डाळ् आऴ्वारों के कुल की एकमात्र सन्तान हैं, और उनकी भक्ति उन सबकी भक्ति से भी आगे है। छोटी आयु में ही वे भक्ति में परिपक्व हो गईं। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि हर दिन प्रेम और आनन्द से उनकी स्तुति करो।

पाशुर 25

एरार् मदुरगवि इव्वुलगिल् वंदुदित्तसीरारुम् सित्तिरैयिल् सित्तिरै नाळ् पारुलगिल्मऱ्ऱुळ्ळ आऴ्वार्गळ् वंदुदित्त नाळ्गळिलुम्उऱ्ऱदॆमक्कॆऩ्ऱु नॆंजे ओर्

अर्थ

चित्तिरै मास का चित्तिरै (चित्रा) नक्षत्र मधुरकवि आऴ्वार् का अवतार-दिवस है। आऴ्वारों के सभी अवतार-दिवसों में यह हमारे लिए सबसे उपयुक्त है, क्योंकि मधुरकवि आऴ्वार् की भक्ति पूरी तरह अपने आचार्य नम्माऴ्वार् को समर्पित थी।

पाशुर 26

वाय्त्त तिरुमंदिरत्तिऩ् मत्तिममाम् पदम् पोल्सीर्त्त मदुरगवि सॆय् कलैयै आर्त्त पुगऴ्आरियर्गळ् तांगळ् अरुळिच्चॆयल् नडुवेसेर्वित्तार् ताऱ्परियम् तेर्ंदु

अर्थ

मधुरकवि आऴ्वार् के छोटे से पाशुर-ग्रन्थ कण्णिनुण् शिऱुत्ताम्बु को आचार्यों ने आऴ्वारों के पाशुर-संग्रह के बीच में रखा। उन्होंने इसका प्रयोजन जानकर ऐसा किया, ठीक वैसे ही जैसे तिरुमन्त्र के बीच में मध्य पद रहता है।

पाशुर 27

इऩ्ऱुलगीर् सित्तिरैयिल् एय्ंद तिरुवादिरै नाळ्ऎऩ्ऱैयिऩुम् इऩ्ऱिदऩुक्कु एऱ्ऱम् ऎऩ् ताऩ् ऎऩ्ऱवर्क्कुच्साऱ्ऱुगिऩ्ऱेऩ् केण्मिऩ् ऎदिराशर् तम् पिऱप्पाल्नाऱ्ऱिशैयुम् कॊंडाडुम् नाळ्

अर्थ

चित्तिरै मास का तिरुवादिरै (आर्द्रा) नक्षत्र किसी भी दूसरे दिन से महान है, और मामुनि बताते हैं क्यों। यह श्री रामानुज (यतिराज) का अवतार-दिवस है, इसलिए सारा संसार इसे मनाता है।

पाशुर 28

आऴ्वार्गळ् तांगळ् अवदरित्त नाळ्गळिलुम्वाऴ्वाऩ नाळ् नमक्कु मण्णुलगीर् एऴ् पारुम्उय्य ऎदिराशर् उदित्तरुळुम् सित्तिरैयिल्सॆय्य तिरुवादिरै

अर्थ

आऴ्वारों के सभी अवतार-दिवसों में जो दिन सचमुच हमें जीवन देता है, वह चित्तिरै का तिरुवादिरै है। उसी दिन श्री रामानुज सब लोकों के उद्धार के लिए संसार में आए।

पाशुर 29

ऎंदै ऎदिराशर् इव्वुलगिल् ऎंदमक्कावंदुदित्त नाळ् ऎऩ्ऩुम् वाशियिऩाल् इंदत्तिरुवादिरै तऩ्ऩिऩ् सीर्मै तऩै नॆंजेऒरुवामल् ऎप्पॊऴुदुम् ओर्

अर्थ

क्योंकि इसी दिन हमारे पिता श्री रामानुज हमारे लिए संसार में आए, मामुनि अपने मन से कहते हैं कि तिरुवादिरै की महिमा कभी मत भूलना। वे चाहते हैं कि इसे वर्ष में केवल एक बार नहीं, सदा मन में रखा जाए।

पाशुर 30

ऎण्णरुम् सीर्प् पॊय्गै मुऩ्ऩोर् इव्वुलगिल् तोऩ्ऱिय ऊर्वण्मै मिगु कच्चि मल्लै मामयिलै मण्णियिल् नीर्तेंगुम् कुऱैयलूर् सीर्क् कलियऩ् तोऩ्ऱिय ऊर्ओंगुम् उऱैयूर् पाणऩ् ऊर्

अर्थ

यहाँ से आऴ्वारों के जन्मस्थान आरम्भ होते हैं। पहले तीन आऴ्वार काञ्ची (पोय्गै आऴ्वार्), आज के मामल्लपुरम् यानी मल्लै (भूतत्ताऴ्वार्) और मयिलापुर् (पेयाऴ्वार्) में अवतरित हुए। तिरुमंगै आऴ्वार् मण्णि नदी के तट पर तिरुक्कुरैयलूर् में और तिरुप्पाण् आऴ्वार् उऱैयूर् में अवतरित हुए।

पाशुर 31

तॊंडरडिप्पॊडियार् तोऩ्ऱिय ऊर् तॊल् पुगऴ् सेर्मंडंगुडि ऎऩ्बर् मण्णुलगिल् ऎंडिशैयुम्एत्तुम् कुलशेगरऩ् ऊर् ऎऩ उरैप्पर्वाय्त्त तिरुवंजिक्कळम्

अर्थ

तोण्डरडिप्पोडि आऴ्वार् तिरुमण्डङ्गुडि में और कुलशेखर आऴ्वार् तिरुवञ्जिक्कळम् में अवतरित हुए। सब जगह लोग इन दोनों स्थानों का आदर करते हैं।

पाशुर 32

मऩ्ऩु तिरुमऴिशै माडत् तिरुक्कुरुगूर्मिऩ्ऩु पुगऴ् विल्लिबुत्तूर् मेदिऩियिल् नऩ्ऩॆऱियोर्एय्ंद पत्तिशारर् ऎऴिल् माऱऩ् पट्टर् पिराऩ्वाय्ंदुदित्त ऊर्गळ् वगै

अर्थ

तिरुमऴिशै आऴ्वार् तिरुमऴिशै में, नम्माऴ्वार् तिरुक्कुरुगूर् में और पेरियाऴ्वार् श्रीविल्लिपुत्तूर् में अवतरित हुए। ये वे नगर हैं जहाँ वे प्रकट हुए।

पाशुर 33

सीरारुम् विल्लिबुत्तूर् सॆल्वत् तिरुक्कोळूर्एरार् पॆरुंबूदूर् ऎऩ्ऩुम् इवै पारिल्मदियारुम् आंडाळ् मदुरगवि आऴ्वार्ऎदिराशर् तोऩ्ऱिय ऊर् इंगु

अर्थ

आण्डाळ् श्रीविल्लिपुत्तूर् में, मधुरकवि आऴ्वार् तिरुक्कोळूर् में और श्री रामानुज श्रीपेरुम्बुदूर् में अवतरित हुए। इस पाशुर के साथ जन्मस्थानों की सूची पूरी होती है।

पाशुर 34

आऴ्वार्गळ् एऱ्ऱम् अरुळिच् चॆयल् एऱ्ऱम्ताऴ्वादुम् इऩ्ऱि अवै ताम् वळर्त्तोर् एऴ् पारुम्उय्य अवर्गळ् सॆय्द वियाक्कियैगळ् उळ्ळदॆल्लाम्वैयम् अऱियप् पगर्वोम् वाय्ंदु

अर्थ

अब मामुनि संसार को चार बातें बताने का वचन देते हैं: आऴ्वारों की महिमा, उनके पाशुरों की महिमा, उन पाशुरों का पोषण करने वाले आचार्य, और सबके कल्याण के लिए आचार्यों द्वारा लिखी गई व्याख्याएँ। आगे के पाशुर इसी वचन को पूरा करते हैं।

पाशुर 35

आऴ्वार्गळैयुम् अरुळिच् चॆयल्गळैयुम्ताऴ्वा निऩैप्पवर्गळ् ताम् नरगिल् वीऴ्वार्गळ्ऎऩ्ऱु निऩैत्तु नॆंजे ऎप्पॊऴुदुम् नी अवर् पाल्सॆऩ्ऱणुगक् कूशित् तिरि

अर्थ

जो लोग आऴ्वारों और उनके पाशुरों को तुच्छ समझते हैं, वे अपना ही विनाश करते हैं। इसलिए मामुनि अपने मन से कहते हैं कि ऐसे लोगों से सदा दूर रहो।

पाशुर 36

तॆरुळुऱ्ऱ आऴ्वार्गळ् सीर्मै अऱिवारार्अरुळिच् चॆयलै अऱिवारार् अरुळ् पॆऱ्ऱनादमुऩि मुदलाम् नम् तेशिगरै अल्लाल्पेदै मऩमे उंडो पेशु

अर्थ

आऴ्वारों और उनके पाशुरों की महिमा को सचमुच कौन जानता है? केवल नाथमुनि से आरम्भ होने वाले हमारे आचार्य, जिन्हें वह कृपा मिली। मामुनि अपने मन से पूछते हैं, क्या कोई और जान सकता है?

पाशुर 37

ओराण् वऴियाय् उबदेशित्तार् मुऩ्ऩोर्एरार् ऎदिराशर् इऩ्ऩरुळाल् पारुलगिल्आशै उडैयोर्क्कॆल्लाम् आरियर्गाळ् कूऱुम् ऎऩ्ऱुपेशि वरंबऱुत्तार् पिऩ्

अर्थ

पूर्वाचार्य गहनतम उपदेश एक समय में केवल एक शिष्य को देते थे। श्री रामानुज ने करुणा से अपने अनुयायियों से कहा कि सीखने की लालसा रखने वाले हर व्यक्ति को सिखाओ, और इस प्रकार उन्होंने वह सीमा हटा दी।

पाशुर 38

ऎंबॆरुमाऩार् तरिशऩम् ऎऩ्ऱे इदऱ्कुनंबॆरुमाळ् पेरिट्टु नाट्टि वैत्तार् अंबुवियोर्इंदत् तरिशऩत्तै ऎंबॆरुमाऩार् वळर्त्तअंदच् चॆयल् अऱिगैक्का

अर्थ

श्रीरंगम के स्वामी नम्पेरुमाळ् ने इस परम्परा को श्री रामानुज के नाम पर 'एम्पेरुमानार् दर्शन' नाम दिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि संसार जाने कि श्री रामानुज ने ही इसका पोषण और प्रसार किया।

पाशुर 39

पिळ्ळाऩ् नंजीयर् पॆरियवाच्चाऩ् पिळ्ळैतॆळ्ळार् वडक्कुत् तिरुवीदिप् पिळ्ळैमणवाळ योगि तिरुवाय्मॊऴियैक् कात्तकुणवाळर् ऎऩ्ऱु नॆंजे कूऱु

अर्थ

मामुनि उन आचार्यों के नाम लेते हैं जिन्होंने अपनी व्याख्याओं से तिरुवाय्मोऴि की रक्षा की: पिळ्ळान्, नंजीयर्, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै और अऴगिय मणवाळ जीयर्। वे अपने मन से कहते हैं कि इन्हें स्मरण करो।

पाशुर 40

मुंदुऱवे पिळ्ळाऩ् मुदलाऩोर् सॆय्दरुळुम्अंद वियाक्कियैगळ् अऩ्ऱागिल् अंदोतिरुवाय्मॊऴिप् पॊरुळैत् तेर्ंदुरैक्क वल्लकुरुवार् इक्कालम् नॆंजे कूऱु

अर्थ

यदि पिळ्ळान् और उनके बाद के आचार्यों ने अपनी व्याख्याएँ न लिखी होतीं, तो हमारे समय में तिरुवाय्मोऴि का अर्थ कौन समझा सकता था? मामुनि अपने मन से इसका उत्तर माँगते हैं।

पाशुर 41

तॆळ्ळारुम् ञाऩत् तिरुक्कुरुगैप् पिराऩ्पिळ्ळाऩ् ऎदिराशर् पेररुळाल् उळ्ळारुम्अऩ्बुडऩे माऱऩ् मऱैप् पॊरुळै अऩ्ऱुरैत्तदुइऩ्ब मिगु आऱायिरम्

अर्थ

श्री रामानुज की कृपा से पिळ्ळान् ने नम्माऴ्वार् की तिरुवाय्मोऴि पर पहली व्याख्या, 'छह हजार' (आऱायिरप्पडि), लिखी। यह आनन्द से भरी व्याख्या है, जो नम्माऴ्वार् के वचनों के प्रति गहरे प्रेम से लिखी गई।

पाशुर 42

तम् सीरै ञाऩियर्गळ् ताम् पुगऴुम् वेदांदिनंजीयर् ताम् पट्टर् नल्लरुळाल् ऎंजादआर्वमुडऩ् माऱऩ् मऱैप् पॊरुळै आय्ंदुरैत्तदुएर् ऒऩ्बदिऩायिरम्

अर्थ

ज्ञानियों द्वारा प्रशंसित नंजीयर् ने अपने गुरु पराशर भट्टर् की कृपा से तिरुवाय्मोऴि पर 'नौ हजार' (ओन्बदिनायिरप्पडि) व्याख्या लिखी। उन्होंने इसे नम्माऴ्वार् का आशय प्रकट करने की बड़ी उत्सुकता से लिखा।

पाशुर 43

नंबिळ्ळै तम्मुडैय नल्लरुळाल् एवियिडपिऩ् पॆरियवाच्चाऩ् पिळ्ळै अदऩाल् इऩ्बावरुबत्ति माऱऩ् मऱैप् पॊरुळैच् चॊऩ्ऩदुइरुबत्तु नालायिरम्

अर्थ

नम्पिळ्ळै की आज्ञा और कृपा से पेरियवाच्चान् पिळ्ळै ने तिरुवाय्मोऴि पर 'चौबीस हजार' (इरुपत्तुनालायिरप्पडि) व्याख्या लिखी। भक्त इसकी भक्ति की मधुरता के कारण इसका रस लेते हैं।

पाशुर 44

तॆळ्ळियदा नंबिळ्ळै सॆप्पु नॆऱि तऩ्ऩैवळ्ळल् वडक्कुत् तिरुवीदिप् पिळ्ळै इंदनाडऱिय माऱऩ् मऱैप् पॊरुळै नऩ्गुरैत्तदुईडु मुप्पत्ताऱायिरम्

अर्थ

वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने तिरुवाय्मोऴि पर नम्पिळ्ळै के प्रवचनों को लिख लिया, ताकि सारा देश उन्हें जान सके। यही ईडु है, 'छत्तीस हजार'।

पाशुर 45

अऩ्बोडु अऴगिय मणवाळच् चीयर्पिऩ्बोरुम् कऱ्ऱऱिंदु पेशुगैक्का तम् पॆरियपोदमुडऩ् माऱऩ् मऱैयिऩ् पॊरुळ् उरैत्तदुएदमिल् पऩ्ऩीरायिरम्

अर्थ

ताकि बाद के समय के लोग इसे सीख सकें, अऴगिय मणवाळ जीयर् ने अपनी गहरी विद्वत्ता से तिरुवाय्मोऴि पर 'बारह हजार' (पन्नीरायिरप्पडि) व्याख्या लिखी। इसे निर्दोष व्याख्या कहकर सराहा जाता है।

पाशुर 46

पॆरियवाच्चाऩ् पिळ्ळै पिऩ्बुळ्ळवैक्कुम्तॆरिय वियाक्कियैगळ् सॆय्वाल् अरियअरुळिच् चॆयल् पॊरुळै आरियर्गट्कु इप्पोदुअरुळिच् चॆयलाय्त्तऱिंदु

अर्थ

पेरियवाच्चान् पिळ्ळै ने आऴ्वारों के बाकी पाशुरों पर भी व्याख्याएँ लिखीं। उन्हीं के कारण बाद के आचार्य उन पाशुरों का अर्थ समझ सके, जिन्हें अन्यथा समझना बहुत कठिन होता।

पाशुर 47

नंजीयर् सॆय्द वियाक्कियैगळ् नालिरंडुक्कुऎंजामै यावैक्कुम् इल्लैये तम् सीराल्वैय कुरुविऩ् तंबि मऩ्ऩु मणवाळ मुऩिसॆय्युमवै तामुम् सिल

अर्थ

नंजीयर् ने सभी पाशुरों पर नहीं, केवल कुछ पर व्याख्याएँ लिखीं। पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई और अऴगिय मणवाळ जीयर् ने भी कुछ ग्रन्थों पर व्याख्याएँ लिखीं।

पाशुर 48

सीरार् वडक्कुत् तिरुवीदिप् पिळ्ळै ऎऴुतेरार् तमिऴ् वेदत्तु ईडु तऩै तारुम् ऎऩवांगि मुऩ् नंबिळ्ळै ईयुण्णि मादवर्क्कुत्ताम् कॊडुत्तार् पिऩ् अदऩैत् ताऩ्

अर्थ

जब वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने ईडु लिख लिया, तो नम्पिळ्ळै ने उसे माँगकर ले लिया। फिर उन्होंने उसे सुरक्षित रखने और आगे सौंपने के लिए ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् को दे दिया।

पाशुर 49

आंगवर् पाल् पॆऱ्ऱ सिऱियाऴ्वाऩ् अप्पिळ्ळैताम् कॊडुत्तार् तम् मगऩार् तम् कैयिल् पांगुडऩेनालूर् पिळ्ळैक्कु अवर् ताम् नल्ल मगऩार्क्कु अवर् ताम्मेलोर्क्कु ईंदार् अवरे मिक्कु

अर्थ

यह पाशुर बताता है कि ईडु कैसे आगे सौंपा गया: ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् से उनके पुत्र को, फिर नालूर् पिळ्ळै को, फिर नालूर् पिळ्ळै के पुत्र को, जिन्होंने इसे बाद के आचार्यों को पढ़ाया। इसी परम्परा से यह मामुनि के अपने गुरु तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै तक पहुँचा।

पाशुर 50

नंबॆरुमाळ् नम्माऴ्वार् नंजीयर् नंबिळ्ळैऎऩ्बर् अवरवर् तम् एऱ्ऱत्ताल् अऩ्बुडैयोर्सात्तु तिरुनामंगळ् ताऩ् ऎऩ्ऱु नऩ्ऩॆंजेएत्तदऩैच् चॊल्लि नी इऩ्ऱु

अर्थ

नम्पेरुमाळ्, नम्माऴ्वार्, नंजीयर् और नम्पिळ्ळै, ये सभी नाम 'नम्' ('हमारे') से आरम्भ होते हैं, और हर एक की महिमा के कारण प्रेम से दिए गए। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि आज इन्हीं नामों से उनकी स्तुति करो।

पाशुर 51

तुऩ्ऩु पुगऴ्क् कंदाडैत् तोऴप्पर् तम् उगप्पाल्ऎऩ्ऩ उलगारियऩो ऎऩ्ऱुरैक्क पिऩ्ऩैउलगारियऩ् ऎऩुम् पेर् नंबिळ्ळैक्कु ओंगिविलगामल् निऩ्ऱदॆऩ्ऱुम् मेल्

अर्थ

नम्पिळ्ळै से प्रसन्न होकर कन्दाडै तोऴप्पर् ने कहा, 'क्या ये सारे संसार के आचार्य हैं?' तब से लोकाचार्य नाम नम्पिळ्ळै के साथ जुड़ गया।

पाशुर 52

पिऩ्ऩै वडक्कुत् तिरुवीदिप् पिळ्ळै अऩ्बाल्अऩ्ऩ तिरुनामत्तै आदरित्तु मऩ्ऩु पुगऴ्मैंदर्क्कुच् चात्तुगैयाल् वंदु परंददु ऎंगुम्इंदत् तिरुनामम् इंगु

अर्थ

अपने गुरु नम्पिळ्ळै के प्रति प्रेम के कारण वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने अपने पुत्र को भी वही नाम दिया। इसी प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य नाम आया और सब ओर फैल गया।

पाशुर 53

अऩ्ऩ पुगऴ् मुडुंबै अण्णल् उलगाशिरियऩ्इऩ्ऩरुळाल् सॆय्द कलै यावैयिलुम् उऩ्ऩिल्तिगऴ् वशऩ पूडणत्तिऩ् सीर्मै ऒऩ्ऱुक्किल्लैपुगऴल्ल इव्वार्त्तै मॆय् इप्पोदु

अर्थ

पिळ्ळै लोकाचार्य के सभी ग्रन्थों में श्रीवचन भूषण के समान कोई नहीं। मामुनि कहते हैं कि यह चाटुकारिता नहीं, सीधा सत्य है।

पाशुर 54

मुऩ्ऩम् कुरवोर् मॊऴिंद वशऩंगळ्तऩ्ऩै मिगक् कॊंडु कऱ्ऱोर् तम् उयिर्क्कु मिऩ्ऩणियाच्सेरच् चमैत्तवरे सीर् वशऩ पूडणमॆऩ्ऩुम्पेर् इक्कलैक्कु इट्टार् पिऩ्

अर्थ

पिळ्ळै लोकाचार्य ने पूर्वाचार्यों के वचनों को एकत्र करके उन्हें विद्वानों के लिए एक चमकते आभूषण की तरह सजाया। इसलिए उन्होंने इस ग्रन्थ का नाम श्रीवचन भूषण रखा, अर्थात् 'वचनों का आभूषण'।

पाशुर 55

आर् वशऩ पूडणत्तिऩ् आऴ् पॊरुळ् ऎल्लाम् अऱिवार्आरदु सॊल् नेरिल् अऩुट्टिप्पार् ओरॊरुवर्उंडागिल् अत्तऩै काण् उळ्ळमे ऎल्लार्क्कुम्अंडाददऩ्ऱो अदु

अर्थ

श्रीवचन भूषण के पूरे गहरे अर्थ को कौन जानता है, और कौन उसके अनुसार जीता है? मामुनि कहते हैं कि यदि ऐसा एक भी व्यक्ति हो, तो वह दुर्लभ है, क्योंकि यह हर किसी की पहुँच की बात नहीं।

पाशुर 56

उय्य निऩैवुडैयीर् उंगळुक्कुच् चॊल्लुगिऩ्ऱेऩ्वैय कुरु मुऩ्ऩम् वाय् मॊऴिंद सॆय्य कलैयाम् वशऩ पूडणत्तिऩ् आऴ्बॊरुळै कऱ्ऱदऩुक्काम् निलैयिल् निल्लुम् अऱिंदु

अर्थ

जो भी उद्धार चाहते हैं, उन सबको मामुनि यह सलाह देते हैं: पिळ्ळै लोकाचार्य के दिए ग्रन्थ श्रीवचन भूषण को अपने आचार्य से सीखो, और जैसा यह सिखाता है वैसा जीवन जियो। भगवान तक पहुँचना चाहने वाले हर व्यक्ति की चिन्ता से वे यह कहते हैं।

पाशुर 57

तेशिगर् पाल् केट्ट सॆऴुम् पॊरुळैच् चिंदै तऩ्ऩिल्माशऱवे ऊऩ्ऱ मऩऩम् सॆय्दु आशरिक्कवल्लार्गळ् ताम् वशऩ पूडणत्तिऩ् वाऩ् पॊरुळैकल्लाददॆऩ्ऩो कवर्ंदु

अर्थ

जो लोग अपने आचार्य से श्रीवचन भूषण सुन सकते हैं, उस पर मनन कर सकते हैं और उसके अनुसार जी सकते हैं, वे इसे क्यों न सीखें? जो इसकी उपेक्षा करते हैं, उन पर मामुनि आश्चर्य करते हैं।

पाशुर 58

सच्चंबिरदायम् ताम् उडैयोर् केट्टक्काल्मॆच्चुम् वियाक्कियैगळ् उंडागिल् नच्चिअदिगरियुम् नीर् वशऩ पूडणत्तुक्कऱ्ऱमदियुडैयीर् मत्तियत्तराय्

अर्थ

मामुनि बताते हैं कि श्रीवचन भूषण को कैसे अपनाएँ: यदि सच्ची परम्परा वालों द्वारा सराही गई व्याख्याएँ हों, तो खुले और सन्तुलित मन से उन्हीं के द्वारा इसे सीखो। यह अपने आचार्य से पढ़ा जाने वाला ग्रन्थ है।

पाशुर 59

सीर् वशऩ पूडणत्तिऩ् सॆंबॊरुळै सिंदै तऩ्ऩाल्तेरिलुमाम् वाय् कॊंडु सॆप्पिलुमाम् आरियर्गाळ्ऎऩ्दऩक्कु नाळुम् इऩिदाग निऩ्ऱदैयोउंदमक्कु ऎव्विऩ्बम् उळदाम्

अर्थ

श्रीवचन भूषण पर विचार करें या उसे ऊँचे स्वर में कहें, मामुनि को यह हर दिन मधुर लगता है। वे दुख के साथ दूसरों से पूछते हैं कि इसके समान कौन-सा आनन्द तुम्हें मिल सकता है?

पाशुर 60

तऩ् कुरुविऩ् ताळिणैगळ् तऩ्ऩिल् अऩ्बु ऒऩ्ऱिल्लादार्अऩ्बु तऩ् पाल् सॆय्दालुम् अंबुयैगोऩ् इऩ्ब मिगुविण्णाडु ताऩ् अळिक्क वेंडियिराऩ् आदलाल्नण्णार् अवर्गळ् तिरुनाडु

अर्थ

जिन्हें अपने आचार्य के चरणों से प्रेम नहीं, वे भगवान से प्रेम दिखाएँ तब भी भगवान के नित्य धाम तक नहीं पहुँचेंगे। लक्ष्मीपति भगवान उन्हें वह धाम नहीं देंगे।

पाशुर 61

ञाऩम् अऩुट्टाऩम् इवै नऩ्ऱागवे उडैयऩाऩकुरुवै अडैंदक्काल् मानिलत्तीर्तेऩार् कमलत् तिरुमामगळ् कॊऴुऩऩ्ताऩे वैगुंदम् तरुम्

अर्थ

मामुनि संसार से कहते हैं कि यदि कोई ऐसे आचार्य के पास जाए जिनमें सच्चा ज्ञान और सदाचार दोनों हों, तो लक्ष्मीपति भगवान स्वयं उसे वैकुण्ठ देंगे। ऐसे आचार्य तक पहुँचना ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग है।

पाशुर 62

उय्य निऩैवुंडागिल् उम् कुरुक्कळ् तम् पदत्तेवैयुम् अऩ्बु तऩ्ऩै इंद मानिलत्तीर् मॆय् उरैक्केऩ्पैयरविल् मायऩ् परम पदम् उंगळुक्काम्कै इलंगु नॆल्लिक् कऩि

अर्थ

यदि तुम उद्धार चाहते हो, तो अपना प्रेम अपने आचार्य के चरणों में लगाओ। मामुनि सच कहते हैं कि तब भगवान का परम धाम हथेली पर रखे आँवले जितना निश्चित हो जाता है।

पाशुर 63

आशारियऩ् सॆय्द उबगारमाऩवदुतूय्दाग नॆंजु तऩ्ऩिल् तोऩ्ऱुमेल् तेशान्तरत्तिल् इरुक्क मऩम् ताऩ् पॊरुंद माट्टादुइरुत्तल् इऩि एदऱियोम् याम्

अर्थ

तुम्हारे आचार्य ने तुम पर जो महान उपकार किया है, यदि वह तुम्हारे हृदय में स्पष्ट चमकता रहे, तो तुम उनसे दूर रहना सह नहीं पाओगे। मामुनि कहते हैं कि वे नहीं समझ पाते कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है।

पाशुर 64

तऩ् आरियऩुक्कुत् ताऩ् अडिमै सॆय्वदु अवऩ्इन्नाडु तऩ्ऩिल् इरुक्कुम् नाळ् अन्नेर्अऱिंदुम् अदिल् आशै इऩ्ऱि आशारियऩैप्पिरिंदिरुप्पार् आर् मऩमे पेशु

अर्थ

आचार्य की सेवा तभी तक हो सकती है जब तक वे इस संसार में हैं। यह जानते हुए, मामुनि अपने मन से पूछते हैं, सेवा की लालसा के बिना कौन उनसे दूर रहेगा?

पाशुर 65

आशारियऩ् सिच्चऩ् आरुयिरैप् पेणुमवऩ्तेशारुम् सिच्चऩ् अवऩ् सीर् वडिवै आशैयुडऩ्नोक्कुमवऩ् ऎऩ्ऩुम् नुण्णऱिवैक् केट्टु वैत्तुम्आर्क्कुम् अन्नेर् निऱ्कै अरिदाम्

अर्थ

आचार्य शिष्य की आत्मा की चिन्ता करते हैं, और शिष्य प्रेम भरी सेवा से आचार्य की शारीरिक आवश्यकताओं का ध्यान रखता है। बहुतों ने यह सुन्दर उपदेश सुना है, फिर भी मामुनि कहते हैं कि इसके अनुसार जीना किसी के लिए भी कठिन है।

पाशुर 66

पिऩ्बऴगराम् पॆरुमाळ् सीयर् पॆरुंदिवत्तिल्अऩ्बदुवुम् अऱ्ऱु मिक्क आशैयिऩाल् नंबिळ्ळैक्काऩअडिमैगळ् सॆय् अन्निलैयै नऩ्ऩॆंजेऊऩमऱ ऎप्पॊऴुदुम् ओर्

अर्थ

पिन्बऴगिय पेरुमाळ् जीयर् ने वैकुण्ठ की लालसा तक को एक ओर रखकर गहरे प्रेम से नम्पिळ्ळै की सेवा की। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि उस उदाहरण पर सदा विचार करो।

पाशुर 67

आशारियर्गळ् अऩैवरुम् मुऩ् आशरित्तआशारम् तऩ्ऩै अऱियादार् पेशुगिऩ्ऱवार्त्तैगळैक् केट्टु मरुळादे पूरुवर्गळ्सीर्त्त निलै तऩ्ऩै नॆंजे सेर्

अर्थ

जो लोग नहीं जानते कि आचार्यों ने कैसे जीवन जिया, उनकी बातों से भ्रमित मत हो। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि पूर्वाचार्यों के श्रेष्ठ मार्ग को ही पकड़े रहो।

पाशुर 68

नात्तिगरुम् नऱ्कलैयिऩ् नऩ्ऩॆऱि सेर् आत्तिगरुम्आत्तिग नात्तिगरुमाम् इवरै ओर्त्तु नॆंजेमुऩ्ऩवरुम् पिऩ्ऩवरुम् मूर्क्कर् ऎऩ विट्टु नडुच्सॊऩ्ऩवरै नाळुम् तॊडर्

अर्थ

लोग तीन प्रकार के होते हैं: जो शास्त्रों को अस्वीकार करते हैं, जो उन्हें स्वीकार करके उनके अनुसार जीते हैं, और जो नाम के लिए उन्हें स्वीकार करते हैं पर उनका पालन नहीं करते। मामुनि अपने मन से कहते हैं कि पहले और अन्तिम को छोड़ दो और बीच वाले सच्चे आस्तिकों का हर दिन अनुसरण करो।

पाशुर 69

नल्ल मणम् उळ्ळदॊऩ्ऱै नण्णि इरुप्पदऱ्कुनल्ल मणम् उंडाम् नलम् अदु पोल् नल्लकुणम् उडैयोर् तंगळुडऩ् कूडि इरुप्पार्क्कुकुणम् अदुवेयाम् सेर्त्ति कॊंडु

अर्थ

सुगन्धित वस्तु के पास रखी चीज स्वयं सुगन्धित हो जाती है। उसी प्रकार जो सज्जनों के संग में रहते हैं, उनमें उनके सद्गुण आ जाते हैं।

पाशुर 70

तीय कंदम् उळ्ळदॊऩ्ऱैच् चेर्ंदु इरुप्पदॊऩ्ऱुक्कुतीय कंदम् एऱुम् तिऱम् अदु पोल् तीयकुणम् उडैयोर् तंगळुडऩ् कूडि इरुप्पार्क्कुकुणम् अदुवेयाम् सॆऱिवु कॊंडु

अर्थ

दुर्गन्ध वाली वस्तु के पास रखी चीज उसकी गन्ध ले लेती है। उसी प्रकार जो बुरे स्वभाव वाले लोगों का संग करते हैं, उनमें उनकी बुरी आदतें आ जाती हैं।

पाशुर 71

मुऩ्ऩोर् मॊऴिंद मुऱै तप्पामल् केट्टुपिऩ्ऩोर्ंदु ताम् अदऩैप् पेशादे तम् नॆंजिल्तोऱ्ऱिऩदे सॊल्लि इदु सुत्त उबदेशवरवाऱ्ऱदॆऩ्बर् मूर्क्कर् आवार्

अर्थ

कुछ लोग बड़ों के दिए उपदेश को ध्यान से नहीं सीखते। जो उनके मन में आता है वही कहते हैं और उसे परम्परा से प्राप्त शुद्ध उपदेश बताते हैं। मामुनि उन्हें मूर्ख कहते हैं।

पाशुर 72

पूरुवाशारियर्गळ् पोदम् अऩुट्टाऩंगळ्कूऱुवार् वार्त्तैगळैक् कॊंडु नीर् तेऱिइरुळ् तरुमा ञालत्ते इऩ्बम् उऱ्ऱु वाऴुम्तॆरुळ् तरुमा तेशिगऩैच् चेर्ंदु

अर्थ

जो पूर्वाचार्यों के ज्ञान और आचरण को निष्ठा से आगे सौंपते हैं, उनके वचनों से सीखो और मन को स्पष्ट करो। फिर, मामुनि कहते हैं, किसी ज्ञानी आचार्य को दृढ़ता से पकड़कर इस अन्धकार भरे संसार में भी आनन्द से जियो।

पाशुर 73

इंद उबदेश रत्तिऩ मालै तऩ्ऩैसिंदै तऩ्ऩिल् नाळुम् सिंदिप्पार् ऎंदैऎदिराशर् इऩ्ऩरुळुक्कु ऎऩ्ऱुम् इलक्कागिसदिराग वाऴ्ंदिडुवर् ताम्

अर्थ

मामुनि कहते हैं कि जो इस उपदेश रत्नमाला का हर दिन चिन्तन करते हैं, वे सदा के लिए श्री रामानुज की कृपा के पात्र बनते हैं और अच्छा जीवन जीते हैं। इसी आशीर्वाद के साथ वे अपने पाशुर समाप्त करते हैं।

पाशुर 74

मऩ्ऩुयिर्गाळ् इंगे मणवाळ मामुऩिवऩ्पॊऩ्ऩडियाम् सॆंगमलप् पोदुगळै उऩ्ऩिच्सिरत्ताले तींडिल् अमाऩवऩुम् नम्मैकरत्ताले तींडल् कडऩ्

अर्थ

परम्परा से कहा जाता है कि यह समापन पाशुर मणवाळ मामुनि के शिष्य एऱुम्बियप्पा का है। वे सभी जीवों से कहते हैं कि यदि वे प्रेम भरे चिन्तन में मामुनि के चरण-कमलों को अपने सिर पर धारण करें, तो वैकुण्ठ की देहली पर जीवों को ग्रहण करने वाले अमानव अपना कर्तव्य मानकर उनका हाथ पकड़ लेंगे।

पाठ को koyil.org, acharya.org, Tamil Wikisource से श्लोक-दर-श्लोक मिलाया गया है। अर्थ पाठक की सहायता के लिए सरल रूप में दिए गए हैं; पाठ किसी अध्यापक से सीखें।

ये पाठक की सहायता के लिए छोटे परिचय हैं; स्वयं इन ग्रन्थों का अध्ययन अपने आचार्य के अधीन करना सबसे अच्छा है।

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