सरल श्लोकों में यह भगवान के प्रति शरणागति सिखाता है और द्वय मन्त्र का अर्थ खोलता है। पूर्वाचार्यों का यह सबसे प्राचीन संस्कृत स्तोत्र है जो आज भी उपलब्ध है। पेरिय नम्बि ने काञ्चीपुरम् में इसके श्लोकों का पाठ किया, और उन्हें सुनकर युवा रामानुज सम्प्रदाय की ओर खिंचे चले आए।
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अर्थ
आळवन्दार् अपने पितामह नाथमुनि को प्रणाम करते हैं। नाथमुनि का ज्ञान और वैराग्य विचार से परे और अद्भुत था, और भगवान की कृपा से उन्हें बिना किसी परिश्रम के प्राप्त हुआ था। वे भगवान के प्रति गहरी भक्ति के सागर थे।
अर्थ
फिर से आळवन्दार् नाथमुनि को प्रणाम करते हैं, जो मधुसूदन श्रीमन्नारायण के चरणकमलों के सच्चे ज्ञान और उनके प्रति प्रेम की अंतिम सीमा तक पहुँचे थे। इस लोक में और परलोक में भी नाथमुनि के चरण ही आळवन्दार् का एकमात्र आश्रय हैं।
अर्थ
एक बार फिर वे इन्द्रियों को वश में रखने वालों में श्रेष्ठ नाथमुनि को प्रणाम करते हैं। उनसे अच्युत के विषय में भक्ति और ज्ञान का सागर उमड़कर मंगलमय वचनों के रूप में इस संसार में बह निकला। वे भक्ति के पूर्ण स्वरूप, परम कल्याण के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए।
अर्थ
आळवन्दार् मुनियों में श्रेष्ठ, उदार महर्षि पराशर को प्रणाम करते हैं। पराशर ने हमें पुराणों में रत्न, विष्णु पुराण दिया। वह सचमुच चेतन जीवों, अचेतन जगत और भगवान को, उनके स्वभावों को, सांसारिक सुख और मोक्ष को, प्रत्येक के साधन को, और जीव अंत में जहाँ जाते हैं उस गति को दिखाता है।
अर्थ
हमारे कुल के प्रथम प्रधान नम्माऴ्वार् के चरण, जो वकुल पुष्पों से सुशोभित हैं, मेरे लिए और मेरे बाद आने वाले सभी के लिए सब कुछ हैं: माता, पिता, पत्नी, संतान और धन। उन सुंदर चरणों को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ।
अर्थ
यहाँ भगवान की स्तुति आरंभ होती है। आळवन्दार् कमलनयन भगवान के चरणकमलों की स्तुति करेंगे, जो उनके कुल की निधि और कुलदेवता हैं। वे चरण उनके अपने सिर पर और वेदों के शिखर पर शोभायमान हैं, और उनकी हर इच्छा उन्हीं में पूर्ण होती है।
अर्थ
ब्रह्मा, शिव और अन्य देवता भी भगवान की महिमा के सागर की एक बूँद के एक छोटे से कण को भी सचमुच नहीं माप सकते। आळवन्दार् स्वयं पर हँसते हैं: वे उस महिमा की स्तुति करने निकले उस निर्लज्ज कवि को, यानी स्वयं को, प्रणाम करते हैं!
अर्थ
फिर उन्हें साहस मिलता है। भगवान की सदा स्तुति करने वाले वेद, ब्रह्मा और अन्य भी उनकी स्तुति केवल उतनी ही कर सकते हैं जितनी उनकी शक्ति और समझ है। जब एक अणु और एक विशाल पर्वत दोनों सागर में डूब जाते हैं, तो उनमें कोई अंतर नहीं रहता। इसलिए आळवन्दार् का छोटा-सा प्रयास भी उन सबके प्रयास जितना ही उचित है।
अर्थ
भगवान किसी कवि पर उसकी बड़ी प्रतिभा के कारण कृपा नहीं करते। वे स्तुति में लगे प्रयास से द्रवित होते हैं। आळवन्दार् जैसे मंद बुद्धि वाले के लिए वह प्रयास सहज ही आ जाता है, इसलिए यह प्रयत्न उन्हें भली-भाँति शोभा देता है, हे कमलनयन प्रभु।
अर्थ
यदि भगवान अपनी दृष्टि न डालें, तो ये लोक कार्य करना तो दूर, उत्पन्न भी नहीं हो सकते। वे स्वभाव से ही हर प्राणी के मित्र हैं। इसलिए, आळवन्दार् कहते हैं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे अपनी शरण में आए लोगों के प्रति इतने कोमल हैं।
अर्थ
हे नारायण, वेदों का कौन अनुयायी यह स्वीकार नहीं करेगा कि आपका ऐश्वर्य स्वाभाविक, असीम और सबसे परे है? ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, और स्वयं पर शासन करने वाला मुक्त जीव भी आपकी महिमा के सागर की फुहार की नन्ही बूँदें मात्र हैं।
अर्थ
स्वयं श्री महालक्ष्मी के प्रियतम और उनकी संपदा कौन हैं? शुद्ध सत्त्व का धाम कौन हैं? कमलनयन पुरुषोत्तम कौन हैं? चेतन और अचेतन प्राणियों सहित यह सारा विश्व किसके अंश के भी सूक्ष्मतम अंश में स्थित है? इसका उत्तर केवल श्रीमन्नारायण हैं।
अर्थ
वेदों की चोरी, घोर पाप और दैत्यों के उत्पीड़न जैसे संकटों से ब्रह्मा और शिव को और किसने बचाया, और फिर उन्हें बड़े वरदान दिए? किसके चरणों का जल शिव ने पवित्र होने के लिए अपने सिर पर धारण किया? केवल भगवान के।
अर्थ
शिव और ब्रह्मा सहित यह विश्व किसके उदर में विश्राम करता है? इसकी रक्षा कौन करता है, और यह किसकी नाभि से उत्पन्न हुआ? आपके सिवा और किसने इसे अपने पगों से नापा, इसे निगला और फिर बाहर निकाला? कौन यह संदेह भी कर सकता है कि आप किसी और पर निर्भर हैं?
अर्थ
आसुरी स्वभाव वाले लोग भगवान को कभी नहीं समझ सकते। उनका शील, उनका रूप और उनके कर्म, उनका परम सत्त्व, सत्त्व से उत्पन्न प्रबल शास्त्र, और तत्त्व के महान ज्ञानियों का उपदेश, ये सब उन्हीं की ओर संकेत करते हैं, फिर भी वे लोग उन्हें नहीं पहचान पाते।
अर्थ
भगवान की परात्परता काल, देश और वस्तु की हर सीमा से परे है; न कुछ उसके बराबर है, न उससे ऊपर। वे अपनी अद्भुत शक्ति से उसे छिपा भी लेते हैं। फिर भी कुछ लोग, जिनका प्रेम केवल उन्हीं पर टिका है, उसे हर समय देखते हैं।
अर्थ
ब्रह्माण्ड और उसके भीतर का सब कुछ, उसे ढकने वाले आवरण जिनमें हर एक पिछले से दस गुना बड़ा है, प्रकृति के तीन गुण, मूल प्रकृति, जीवात्माएँ, परमपद, और उससे भी ऊपर जो कुछ है: ये सब भगवान की अपनी विभूति हैं और उन्हीं के हैं।
अर्थ
भगवान सबको वश में रखने वाले, उदार, सद्गुणों से पूर्ण, सरल और पवित्र हैं। वे सौम्य, दयालु, मधुर, स्थिर और सबके प्रति समान हैं। वे सब कुछ करने वाले हैं और अपने प्रति किए गए हर छोटे उपकार को याद रखते हैं। अपने स्वभाव से ही वे समस्त कल्याण गुणों के अमृत के सागर हैं।
अर्थ
वेद भगवान के एक गुण का भी वर्णन करने का प्रयास करते हैं। वे ब्रह्मा से ऊपर और ऊपर, सीढ़ी-दर-सीढ़ी, हर एक सौ गुना महान प्राणियों की कल्पना करते हैं। फिर भी वे उस एक गुण के आरंभ से आगे कभी नहीं बढ़ पाते।
अर्थ
जो भगवान की शरण में आ गए हैं, उनके लिए संसार की सृष्टि, पालन और संहार, या जीवों को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करना भी केवल खेल है। वेदों के विधान भी उनके भक्तों के हृदय की गहरी इच्छाओं का अनुसरण करते हैं।
अर्थ
उन भगवान को बार-बार नमस्कार, जो वाणी और मन से परे हैं, फिर भी भक्तों की वाणी और मन के एकमात्र विश्राम-स्थान हैं। उन्हें नमस्कार जिनकी महिमा का कोई अंत नहीं, जो अनंत करुणा के एकमात्र सागर हैं।
अर्थ
यह आळवन्दार् की शरणागति है। वे कहते हैं कि उनमें धर्म का दृढ़ पालन नहीं है, आत्मा का ज्ञान नहीं है, और भगवान के चरणकमलों में भक्ति भी नहीं है। कुछ भी न होने और कोई दूसरा आश्रय न होने के कारण, वे सबके आश्रय भगवान के चरणों की शरण लेते हैं।
अर्थ
संसार में ऐसा कोई बुरा कर्म नहीं जो आळवन्दार् ने हजारों बार न किया हो। अब जब वे कर्म फल दे रहे हैं, वे कहते हैं, वे असहाय होकर मुकुन्द के सामने खड़े हैं और पुकार रहे हैं।
अर्थ
हे अनन्त प्रभु, मैं बहुत समय से जन्म और मृत्यु के सागर में डूब रहा हूँ, और अब मैंने आपको अपने किनारे के रूप में पा लिया है। प्रभु, आपने भी अब मुझमें अपनी दया का सबसे उत्तम पात्र पा लिया है।
अर्थ
मुझ पर ऐसा कुछ नहीं आ सकता जो पहले न आया हो, और मैं सब सह सकता हूँ, क्योंकि दुःख मेरे लिए स्वाभाविक है। पर यदि आपकी शरण में आया हुआ कोई आपके ही सामने पराजित हो जाए, हे प्रभु, तो यह आपकी महिमा के योग्य नहीं होगा।
अर्थ
हे महाप्रभु, आप मुझे दूर भी धकेल दें, तब भी मैं आपके चरणकमलों को नहीं छोड़ सकता। क्रोधित माँ द्वारा दूर धकेला गया दूध पीता शिशु भी उसके चरणों को छोड़ना कभी नहीं चाहता।
अर्थ
जब किसी का हृदय भगवान के अमृत बहाने वाले चरणकमलों पर टिक जाता है, तो वह और कुछ कैसे चाह सकता है? जब मधु से भरा कमल सामने हो, तो भौंरा मधु-रहित फूल की ओर देखता भी नहीं।
अर्थ
भगवान के चरणों की ओर एक बार भी, किसी भी समय, कोई भी, किसी भी प्रकार से हाथ जोड़ ले, तो उसी क्षण वह अंजलि हर बुराई को मिटा देती है और शुभ को बढ़ाती है। उसकी शक्ति कभी क्षीण नहीं होती।
अर्थ
भगवान के दोनों लाल चरणकमलों के प्रति प्रेम के सागर की एक बूँद भी, सांसारिक जीवन की धधकती दावाग्नि को क्षण भर में बुझा देती है और परम आनंद देती है।
अर्थ
भगवान के चरणकमलों ने ऊपर और नीचे के सभी लोकों को खेल-खेल में नाप लिया, और वे प्रणाम करने वाले किसी के भी दुःख को दूर करने के लिए शीघ्रता करते हैं। वे चरण ही आळवन्दार् की संपत्ति हैं। वे पूछते हैं, मैं उन्हें अपनी आँखों से कब देखूँगा?
अर्थ
हे त्रिविक्रम, शंख, चक्र, कल्पवृक्ष, ध्वजा, कमल, अंकुश और वज्र के चिह्नों से अंकित आपके दोनों चरणकमल कब मेरे सिर को सुशोभित करेंगे?
अर्थ
अब आळवन्दार् उन भगवान का चित्र मन में बनाने लगते हैं जिनकी सेवा के लिए वे तरसते हैं। वे चमकीले पीले रेशमी वस्त्र में शोभायमान हैं, और उनकी श्यामल, निर्मल कांति अतसी पुष्प जैसी है। उनकी गहरी नाभि, पतली कमर और चौड़ा वक्षस्थल है, जो उनके सौंदर्य का चिह्न है।
अर्थ
भगवान की चार सुंदर भुजाएँ घुटनों तक पहुँचती हैं, जो धनुष की डोरी के घावों के निशानों से कठोर हो गई हैं। उन पर अपनी प्रियतमा को आलिंगन करने के चिह्न हैं, जिसका कमल का कर्णाभूषण और खुले केश उनसे दबे थे।
अर्थ
ऊँचे, भरे हुए कंधों तक कुंडल लटकते हैं, और शंख के आकार की गर्दन पर घुँघराली लटें गिरती हैं। उनके मुख की शोभा निर्मल पूर्णचंद्र और कमल दोनों से बढ़कर है।
अर्थ
उनके मनोहर नेत्र अभी-अभी खिले कमलों जैसे हैं, उनकी भौंहें लताओं की तरह लीला से हिलती हैं, और उनके होंठ दमकते हैं। उनकी निर्मल मुस्कान, कोमल कपोल, सुंदर नासिका, और माथे के किनारे तक गिरती अलकें हैं।
अर्थ
वे चमकते मुकुट, बाजूबंद, हार, कौस्तुभ, करधनी और नूपुरों से शोभित हैं। वे अपने सुंदर आयुध धारण करते हैं: चक्र, शंख, खड्ग, गदा और धनुष। वे तुलसी से सुगंधित वनमाला पहनते हैं।
अर्थ
यहाँ आळवन्दार् श्री महालक्ष्मी का वर्णन करते हैं। उन्होंने भगवान के वक्षस्थल को अपना निवास बनाया। जिस क्षीरसागर में उनका जन्म हुआ, वह भगवान का प्रिय निवास है। सारा संसार उनके कटाक्ष पर निर्भर है, और उनके लिए ही सागर का मंथन हुआ और उस पर सेतु भी बाँधा गया।
अर्थ
भगवान श्री महालक्ष्मी का उनके सभी रूपों में सदा आनंद लेते हैं, फिर भी वे हर बार उन्हें आश्चर्य से भर देती हैं, मानो वे नई हों। अपने गुणों, अपने रूप और अपनी लीलाओं में वे केवल भगवान के ही पूर्णतः योग्य हैं।
अर्थ
भगवान उनके साथ आदिशेष पर विराजते हैं, वह नाग जो महान ज्ञान और बल का धाम है। आदिशेष के फणों पर जड़ी मणियों का प्रकाश उस दिव्य स्थान के भीतर को प्रकाशित करता है।
अर्थ
आदिशेष भगवान के लिए निवास, शय्या, आसन, पादुकाएँ, वस्त्र, तकिया, और वर्षा व धूप से बचाने वाला छत्र बन जाते हैं। भगवान की सेवा के लिए वे ये सभी रूप धारण करते हैं, इसलिए लोग उन्हें ठीक ही शेष कहते हैं, अर्थात् वह जो केवल भगवान के लिए ही है।
अर्थ
भगवान के सामने गरुड़ खड़े हैं, जो उनके सेवक, सखा, वाहन, आसन और ध्वजा हैं, उनका चँदोवा और पंखा हैं, और जिनका शरीर ही वेदमय है। भगवान के चरणों के दबाव से उन पर पड़े चिह्नों से गरुड़ सुंदर लगते हैं।
अर्थ
भगवान के प्रिय सेनापति विष्वक्सेन भगवान के भोजन के बाद बचा हुआ प्रसाद ग्रहण करते हैं। भगवान ने अपने लोकों को चलाने का पूरा भार उन्हें सौंप दिया है। जब विष्वक्सेन सब कुछ निवेदन करते हैं, तो भगवान कृपापूर्ण दृष्टि से स्वीकृति देते हैं।
अर्थ
भगवान की सेवा उनके अन्य परिचारक, नित्यसूरि करते हैं। स्वभाव से ही वे हर दोष और त्रुटि से मुक्त हैं, उनका एकमात्र आनंद भगवान को प्रसन्न करने वाला कार्य करना है, और हर एक अपनी सेवा के लिए आवश्यक वस्तुएँ लिए रहता है।
अर्थ
भगवान अपनी रानी श्री महालक्ष्मी को नित्य-नवीन लीला से आनंदित करते हैं, जो हर प्रकार के भावों से भरी है और एक साथ भोली भी है और चतुर भी। उसमें युग क्षण भर की तरह बीत जाते हैं। वे महाबाहु हैं।
अर्थ
भगवान अमृत के सागर हैं, ऐसे यौवन और सौंदर्य से बने हैं जो विचार से परे, दिव्य, अद्भुत और नित्य है। वे स्वयं श्री महालक्ष्मी की शोभा और अपने भक्तों के प्राण हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं, संकट में मित्र हैं, और माँगने वाले हर किसी के लिए कल्पवृक्ष हैं।
अर्थ
यह श्लोक पहले आरंभ हुए लंबे वाक्य को पूरा करता है। आळवन्दार् पूछते हैं, कब मैं, हर दूसरी इच्छा शांत करके, आपका नित्य सेवक बनकर, बिना रुके केवल आपका ही अनुसरण करूँगा? कब मैं आपको आनंद दूँगा, और जानूँगा कि मेरे जीवन का कोई स्वामी है?
अर्थ
फिर आळवन्दार् लज्जित होते हैं। वे कहते हैं, धिक्कार है मुझे: अपवित्र, अनुशासनहीन, निर्दय और निर्लज्ज! ब्रह्मा, शिव, सनक और बड़े-बड़े योगी भी ध्यान में उस सेवा तक पहुँचना कठिन पाते हैं, और मैं उसे बस इसलिए चाहता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है।
अर्थ
हे हरि, मैं हजारों अपराधों का भार लिए संसार के भयानक सागर में गिर पड़ा हूँ। मेरे पास कोई और उपाय नहीं है और मैं आपकी शरण में आया हूँ। केवल अपनी दया से मुझे अपना बना लीजिए।
अर्थ
सांसारिक जीवन एक तूफानी दिन जैसा है: मोह के घने बादलों से दिशाएँ अंधेरी हैं, और दुःख बिना रुके बरस रहा है। हे प्रभु, हे अच्युत, मैं मार्ग से फिसल गया हूँ। कृपया मेरी ओर देखिए।
अर्थ
यह चाटुकारिता नहीं, सीधा सत्य है, प्रभु। कृपया एक विनती सुनिए। यदि आप मुझ पर दया नहीं करेंगे, तो आपको अपनी दया के लिए मुझसे अधिक योग्य कोई शायद ही मिलेगा।
अर्थ
आपके बिना मेरा कोई रक्षक नहीं, और मेरे बिना आपके पास दया का इतना जरूरतमंद कोई नहीं। यह संबंध आपकी अपनी इच्छा से बना है। प्रभु, इसकी रक्षा कीजिए और इसे कभी मत छोड़िए।
अर्थ
शरीर और स्वभाव से मैं जो कुछ भी हूँ, और मेरे गुण जैसे भी हों, अच्छे या बुरे, अपना यही स्वरूप अब मैं आपके चरणकमलों में अर्पित करता हूँ।
अर्थ
फिर वे स्वयं को सुधारते हैं: हे माधव, मेरे स्वामी, जो कुछ मेरा है और जो कुछ मैं हूँ, वह पहले से ही आपका है। अब जब मैं यह समझ गया हूँ, तो आपको अर्पित करने के लिए मेरे पास क्या है?
अर्थ
प्रभु, आपने स्वयं मुझे यह समझाया कि मैं सदा के लिए आपका हूँ। उसी प्रकार, कृपया मुझे ऐसी भक्ति दीजिए जो आपके सिवा और कोई आनंद न चाहे।
अर्थ
जो आपकी सेवा के आनंद से प्रेम करते हैं, उनके घरों में मुझे कीड़े के रूप में भी जन्म लेने दीजिए। कहीं और, ब्रह्मा के रूप में भी, मुझे कभी जन्म न लेने दीजिए।
अर्थ
कुछ महात्मा आपके रूप को बस एक बार देखने की लालसा में सर्वोच्च सुखों को, और मोक्ष को भी, तिनके के समान मानते हैं। उनके लिए आपसे एक क्षण का भी वियोग असहनीय है। कृपया ऐसे महात्माओं की कृपादृष्टि मुझ पर पड़ने दीजिए।
अर्थ
मेरा शरीर, मेरा जीवन, कोई भी सुख जिसकी मैं इच्छा करूँ, यहाँ तक कि मेरी अपनी आत्मा भी: यदि कुछ भी आपके दास होने के आनंद से बाहर है, तो मैं उसे एक क्षण भी सहन नहीं कर सकता। वह सौ टुकड़ों में बिखर जाए। हे मधुसूदन, यही मेरी सच्ची विनती है।
अर्थ
मैं ऐसे भारी पाप का बोझ ढो रहा हूँ जिसका न आदि है न अंत, और जिससे मैं बच नहीं सकता। मेरा आचरण नीच है, मैं मनुष्यों में पशु हूँ, हर बुराई का घर हूँ। फिर भी, हे करुणासागर, मेरे सच्चे बंधु, अनंत वात्सल्य के सागर, मैं आपके गुणों को बार-बार याद करता हूँ, और इसलिए भय से मुक्त होना चाहता हूँ।
अर्थ
रजोगुण और तमोगुण से ढका हुआ, मैंने स्तुति के ये वचन ऐसे रचे मानो मैं सचमुच आपके लिए तरसता हूँ, जबकि ऐसा नहीं था। फिर भी, हे पृथ्वी को धारण करने वाले प्रभु, इन वचनों को ही पकड़कर, कृपया मेरे मन को सिखाइए कि वह ठीक वैसा ही बन जाए जैसा ये वचन कहते हैं।
अर्थ
आप ही मेरे पिता, मेरी माता, मेरे प्रिय पुत्र और मेरे प्रिय मित्र हैं। आप ही मेरे साथी, मेरे गुरु और सभी लोकों के लक्ष्य हैं। मैं आपका हूँ, आपका दास हूँ, आपका सेवक हूँ, आप ही मेरे एकमात्र लक्ष्य हैं। मैंने शरणागति की है, इसलिए मैं आपकी जिम्मेदारी हूँ।
अर्थ
मैं संसार में प्रसिद्ध एक महान कुल में जन्मा। उस कुल के लोग पवित्र और योग में स्थिर थे, प्रकृति और आत्मा का सत्य जानते थे, और स्वभाव से ही केवल आपके चरणकमलों के भक्त थे। फिर भी मैं, एक पापी, अंधकार में और गहरे डूबता जा रहा हूँ, हे शरण देने वाले।
अर्थ
मैं कोई मर्यादा नहीं रखता। मैं नीच और चंचल हूँ, ईर्ष्या की जन्मभूमि हूँ, कृतघ्न, घमंडी, कामना के वश में, छल का आदी, क्रूर और महापापी हूँ। मुझ जैसा कोई दुःख के इस किनारा-रहित सागर को कैसे पार करेगा और आपके चरणों की सेवा कैसे करेगा?
अर्थ
हे रघुश्रेष्ठ, आपने उस कौए पर भी दया की, केवल इसलिए कि वह आपके चरणों में गिर पड़ा। और कृष्ण के रूप में, हे सरल हृदय प्रभु, आपने शिशुपाल को भी अपने साथ एकत्व दिया, यद्यपि उसने जन्म-जन्मांतर आपका अपराध किया था। बताइए, कौन-सा अपराध आपकी सहनशीलता के लिए बहुत बड़ा है?
अर्थ
निश्चय ही मैंने एक बार 'मैं आपका हूँ' कहकर आपकी शरण ली है। इसलिए मैं वह हूँ जिस पर आपको दया करनी ही होगी। आपने प्रतिज्ञा की है कि एक बार भी शरण में आने वाले की आप रक्षा करेंगे। उस प्रतिज्ञा को याद रखते हुए, क्या आप केवल मुझे ही छोड़ देंगे?
अर्थ
आळवन्दार् अपने पितामह नाथमुनि की ओर संकेत करते हुए समापन करते हैं। भगवान के चरणकमलों के प्रति उनका प्रेम स्वाभाविक था और अपने चरम शिखर तक पहुँचा था, और उन्होंने स्वयं पर विजय पाई थी। प्रभु, उनकी ओर देखिए, और मेरे अपने आचरण को तौले बिना मुझ पर कृपा कीजिए।
पाठ को prapatti.com, sanskritdocuments.org, GRETIL, koyil.org, sadagopan.org से श्लोक-दर-श्लोक मिलाया गया है। अर्थ पाठक की सहायता के लिए सरल रूप में दिए गए हैं; पाठ किसी अध्यापक से सीखें।
ये पाठक की सहायता के लिए छोटे परिचय हैं; स्वयं इन ग्रन्थों का अध्ययन अपने आचार्य के अधीन करना सबसे अच्छा है।
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