चार श्लोकों का एक छोटा स्तोत्र, श्रीमन्नारायण की दिव्य पत्नी श्री महालक्ष्मी की महिमा पर।
अर्थ
हे समस्त कल्याणकारी गुणों से परिपूर्ण श्री महालक्ष्मी, आपके प्रियतम स्वयं पुरुषोत्तम श्रीमन्नारायण हैं। सर्पों के राजा आदिशेष आपकी शय्या और आसन हैं; जिनका शरीर ही वेद है, वे गरुड़ आपको वहन करते हैं; जगत से सत्य को छिपाने वाली, मोह में डालने वाली प्रकृति की शक्ति आपके परदे के रूप में टँगी है; और ब्रह्मा, शिव तथा सभी देवता अपनी पत्नियों सहित दास-दासियों के रूप में आपकी सेवा में खड़े रहते हैं। आपका नाम ही श्री है। ऐसी महिमा वाली आपकी स्तुति के लिए हम जैसे लोगों को शब्द कहाँ से मिलेंगे?
अर्थ
आपकी महिमा की कोई सीमा नहीं है, और वह अपने स्वभाव से ही सदा भगवान के साथ पूर्ण सामंजस्य में रहती है। आपके प्रियतम और सबके स्वामी भगवान भी उसकी थाह नहीं पा सकते, ठीक वैसे ही जैसे वे अपनी महिमा की थाह नहीं पा सकते। फिर भी, क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप कितनी करुणामयी हैं, मैं बिना किसी भय के, केवल आपके दास के रूप में और आपकी शरण में आए हुए के रूप में आपकी स्तुति करता हूँ। हे समस्त लोकों की एकमात्र रानी, लोकनाथ की परम प्रिया, हे क्षमाशील और कोमल स्वभाव वाली!
अर्थ
जब तक तीनों लोक आपकी दृष्टि से वंचित रहे, वे विनाश को प्राप्त हो गए थे। अब आपकी करुणा भरी दृष्टि के अमृत की एक छोटी-सी बूँद से ही फिर से जीवित होकर वे सुरक्षित हैं और अनंत रूप से समृद्ध हो रहे हैं। कमलनयन भगवान के हृदय को प्रिय देवी की कृपा के बिना किसी को भी कोई भलाई नहीं मिलती, चाहे वह सांसारिक ऐश्वर्य हो, आत्मा का स्वयं अपने आप का आनंद हो, या श्रीमन्नारायण के अपने धाम तक ले जाने वाला मार्ग हो। इसीलिए सम्प्रदाय भगवान के पास उन्हीं के माध्यम से जाता है: वे ही पुरुषकार हैं, जो भगवान से हमारी सिफ़ारिश करती हैं।
अर्थ
हरि का एक परम रूप है, जो शांत, अनंत और ऐश्वर्य से परिपूर्ण है, जिसे शास्त्र ब्रह्म कहते हैं। उनका एक दृश्य दिव्य रूप भी है, जो अद्भुत है और उन्हें उससे भी अधिक प्रिय है। और संसार में अपनी लीला करते हुए वे अपनी इच्छा से अनेक अन्य रूप भी धारण करते हैं। ज्ञानी कहते हैं कि इनमें से प्रत्येक रूप में आप उनके अनुरूप अपना रूप और ऐश्वर्य धारण करके उन्हें आलिंगन में निकट थामे रहती हैं, जिससे श्री महालक्ष्मी उनसे कभी अलग नहीं होतीं।
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