आप दोनों नौकरी करते हैं। माता-पिता किसी दूसरे शहर में हैं। बच्चे अपनी स्क्रीन में डूबे हैं। भगवान के लिए वह शांत घड़ी बरसों पहले कहीं खो गई। आप धर्म में असफल नहीं हो रहे हैं। आप कलियुग में जी रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसा ऋषियों ने कहा था।
श्रीमद्भागवत ने इस युग को पहले ही देख लिया था, जब धर्म एक पैर पर खड़ा होगा, और इससे पार होने का मार्ग भी बताया: कलि में भगवान अपने नाम से, शरणागति से और अपने भक्तों के सत्संग से प्राप्त होते हैं। Dharma on One Leg आज उसी तरह जीने के लिए एक सरल, व्यावहारिक मार्गदर्शिका है, जिसकी जड़ें वेदों, उपनिषदों, इतिहासों, पुराणों, दिव्य प्रबन्ध और श्रीवैष्णव आचार्यों में हैं।
इसमें समय न होने पर प्रार्थना, ईमानदार काम, पैसा, विवाह, ससुराल वाले, बच्चे, बूढ़े माता-पिता, बीमारी और शोक, सब पर बात है। हर अध्याय साधना के तीन स्तर देता है, उस न्यूनतम तक जिसे कभी नहीं छोड़ना है, अपने सबसे कठिन दिन भी। यह घटाए गए मानकों की पुस्तक नहीं है। यह पुस्तक बताती है कि असली मानक क्या है।